"दहेज प्रथा" (क्षत्रिय परम्परा या एक कुप्रथा)
आज के समाज में कन्या का पैदा होना एक अभिशाप हो गया है, लोग दहेज की इस प्रकार मांग करते हैं की कोई भी ईमानदार व्यक्ति ईमानदारी से उपार्जित धन के द्वारा उस मांग की पूर्ती नहीं कर सकता है ।इससे स्पष्ट है की दहेज की मांग करने वाले समाज के ईमानदार लोगो को भ्रष्ट होने को बाध्य करते हैं ,क्या ऐसे समाज को आप समाज कहना पसन्द करेगे ? आज जब किसी घर में कन्या का विवाह होता है तो सबसे पहले दहेज की पुर्ति के लिये उसके पिता ,माँ, भाई की जमीन बिकती है ! प्रश्न यह उठता है की आखिर जब जमीन नहीं रहेगी तब क्या बिकेगा ? दुसरा प्रश्न पैदा होता है कि जो बहिन अपने भाई की रोजी रोटी का साधन , उसकी जमीन को बिकवाने का हेतु बनती है उस भाई - बहन के बीच क्या सोहार्द रह पायेगा ? तीसरा प्रश्न है कि वर पक्ष के लोग जो कन्या पक्ष की रोटी रोजी का साधन बिकवाने के हेतु बनते हैं क्या वे सम्बन्धी कहलाने के लायक है व क्या उनके कन्या पक्ष के साथ जीवन में कभी भी मधुर सबंन्ध रह पायेंगे? यदि उपर्युक्त तीनो प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं , तो स्पष्ट है की यह दहेज प्रथा केवल परिवारो की आर्थिक स्थिती को ही नष्ट करने वाली है बल्की यह प्रथा समाज में आपसी वैमनस्य व असामाजिकता का विकास करने में सर्वाधिक सहयोगी है ! अधिक दहेज, अधिक सम्मान यह कल्पना यदि एक व्यक्ति में हो तो उसका ईलाज आसानी से सभंव है , लेकिन समाज का अधिकांश वर्ग ईसी दृष्टि से सोचने लगे तो फिर ईस कुरीती से सघंर्ष करने में बहुत कठिनाईया उत्पन्न हो जाती है ! लोग अपने स्वार्थ के लिये आज दुसरे के हित व अपने भविष्य का बलिदान कर रहें हैं व इस प्रकार स्वयं ही अपने लिये कब्र खोदने में व्यस्त है ! यह सारा कुकर्म परम्पराओ व रिति रिवाजो के नाम पर हो रहा है ! आज वर पक्ष व उसके साथ आने वाला बाराती कन्या पक्ष के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे शोषण करने का अधिकार भगवान द्वारा उन्हे प्रदत किया गया हो ! जबकी हमारे समाज की परम्परा ईसके बिल्कुल विपरीत है ! राजा दशरथ राजा जनक से कहते हैं कि " आप महान हैं , आपकी और मेरी तुलना सभंव नहीं है , आपने कन्या का दान किया है व मैंने दान ग्रहण किया है ! दाता से दान ग्रहण करने वाला कभी बङा नहीं हो सकता है !"
कहने को तो हम भी आज कन्यादान ही करते हैं, लेकिन हम दान नहीं लेते, हम तो धौस व् डर दिखाकर किसी का शोषण कर रहे हैं, जिसको डकैती कहा जा सकता है, ऐसे लोग दान ग्रहण कर्ता नहीं हैं ! क्या यह दशरथ व् जनक द्वारा स्थापित परम्परा है ? और यदि नहीं है तो यह डकैतों की परम्परा क्षत्रिय परम्परा नहीं है ! यदि हमें क्षत्रिय के रूप में जिन्दा रहना है तो इस परम्परा का त्याग करना ही होगा !
पहले लोग दान में भी कुछ न कुछ मर्यादा का निर्वाह करते ही थे ! किस वस्तु का दान लिया जा सकता है या लेना चाहिए यह एक विचारणीय प्रश्न है ! हम तो आज लोहे का भी दान ले रहे हैं, जिसको ब्राह्मण भी धारण नहीं करता! यदि इसी प्रकार से अमर्यादित जीवन पद्दतियां चलती रहीं तो विनाश के सिवाए कोई विकल्प नजर नहीं आता है! इस कुरीति के भी प्रचलन में महिलाओं का सर्वाधिक योगदान है, दूसरों से स्पर्धा कर वे अपने पुत्र के लिए अधिकाधिक दहेज़ की मांग करती हैं व अन्ततोगत्वा यह दहेज़ पुत्र-वधु के दुर्व्यवहार के रूप में प्रकट होकर उनके लिए ही कष्ट का सबसे बड़ा साधन बनता है !
अतः यदि हम चाहते हैं की भाई -बहिन के बीच स्नेह रहे, यदि हम चाहते हैं की हमारी संतानें सुखी पारिवारिक जीवन व्यतीत करें, यदि हम चाहते हैं की पुत्र वधुएँ परिवारजनों का आदर करें, उनकी सेवा करें, तो हमें इस विनाशकारी बुराई से मुक्त होना ही पड़ेगा ! दहेज़ मांगने की परम्परा का परित्याग करना पड़ेगा ! तभी समाज में वास्तविक सामाजिकता का विकाश होगा ! समाज, व्यक्ति तब शोषक नहीं कहलायेगा, लोगों में समाज के प्रति स्नेह उत्पन्न होगा व सामाजिक गतिविधियों में लोगों की रूचि पैदा होगी ..!!
लेखक :- आदरणीय श्री देवीसिंह जी महार
पुस्तक :- क्षत्राणी ,संस्करण -4 (कुवंर आयुवान सिंह जी हुडील स्मृती संस्थान , जयपुर)
आज के समाज में कन्या का पैदा होना एक अभिशाप हो गया है, लोग दहेज की इस प्रकार मांग करते हैं की कोई भी ईमानदार व्यक्ति ईमानदारी से उपार्जित धन के द्वारा उस मांग की पूर्ती नहीं कर सकता है ।इससे स्पष्ट है की दहेज की मांग करने वाले समाज के ईमानदार लोगो को भ्रष्ट होने को बाध्य करते हैं ,क्या ऐसे समाज को आप समाज कहना पसन्द करेगे ? आज जब किसी घर में कन्या का विवाह होता है तो सबसे पहले दहेज की पुर्ति के लिये उसके पिता ,माँ, भाई की जमीन बिकती है ! प्रश्न यह उठता है की आखिर जब जमीन नहीं रहेगी तब क्या बिकेगा ? दुसरा प्रश्न पैदा होता है कि जो बहिन अपने भाई की रोजी रोटी का साधन , उसकी जमीन को बिकवाने का हेतु बनती है उस भाई - बहन के बीच क्या सोहार्द रह पायेगा ? तीसरा प्रश्न है कि वर पक्ष के लोग जो कन्या पक्ष की रोटी रोजी का साधन बिकवाने के हेतु बनते हैं क्या वे सम्बन्धी कहलाने के लायक है व क्या उनके कन्या पक्ष के साथ जीवन में कभी भी मधुर सबंन्ध रह पायेंगे? यदि उपर्युक्त तीनो प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं , तो स्पष्ट है की यह दहेज प्रथा केवल परिवारो की आर्थिक स्थिती को ही नष्ट करने वाली है बल्की यह प्रथा समाज में आपसी वैमनस्य व असामाजिकता का विकास करने में सर्वाधिक सहयोगी है ! अधिक दहेज, अधिक सम्मान यह कल्पना यदि एक व्यक्ति में हो तो उसका ईलाज आसानी से सभंव है , लेकिन समाज का अधिकांश वर्ग ईसी दृष्टि से सोचने लगे तो फिर ईस कुरीती से सघंर्ष करने में बहुत कठिनाईया उत्पन्न हो जाती है ! लोग अपने स्वार्थ के लिये आज दुसरे के हित व अपने भविष्य का बलिदान कर रहें हैं व इस प्रकार स्वयं ही अपने लिये कब्र खोदने में व्यस्त है ! यह सारा कुकर्म परम्पराओ व रिति रिवाजो के नाम पर हो रहा है ! आज वर पक्ष व उसके साथ आने वाला बाराती कन्या पक्ष के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे शोषण करने का अधिकार भगवान द्वारा उन्हे प्रदत किया गया हो ! जबकी हमारे समाज की परम्परा ईसके बिल्कुल विपरीत है ! राजा दशरथ राजा जनक से कहते हैं कि " आप महान हैं , आपकी और मेरी तुलना सभंव नहीं है , आपने कन्या का दान किया है व मैंने दान ग्रहण किया है ! दाता से दान ग्रहण करने वाला कभी बङा नहीं हो सकता है !"
कहने को तो हम भी आज कन्यादान ही करते हैं, लेकिन हम दान नहीं लेते, हम तो धौस व् डर दिखाकर किसी का शोषण कर रहे हैं, जिसको डकैती कहा जा सकता है, ऐसे लोग दान ग्रहण कर्ता नहीं हैं ! क्या यह दशरथ व् जनक द्वारा स्थापित परम्परा है ? और यदि नहीं है तो यह डकैतों की परम्परा क्षत्रिय परम्परा नहीं है ! यदि हमें क्षत्रिय के रूप में जिन्दा रहना है तो इस परम्परा का त्याग करना ही होगा !
पहले लोग दान में भी कुछ न कुछ मर्यादा का निर्वाह करते ही थे ! किस वस्तु का दान लिया जा सकता है या लेना चाहिए यह एक विचारणीय प्रश्न है ! हम तो आज लोहे का भी दान ले रहे हैं, जिसको ब्राह्मण भी धारण नहीं करता! यदि इसी प्रकार से अमर्यादित जीवन पद्दतियां चलती रहीं तो विनाश के सिवाए कोई विकल्प नजर नहीं आता है! इस कुरीति के भी प्रचलन में महिलाओं का सर्वाधिक योगदान है, दूसरों से स्पर्धा कर वे अपने पुत्र के लिए अधिकाधिक दहेज़ की मांग करती हैं व अन्ततोगत्वा यह दहेज़ पुत्र-वधु के दुर्व्यवहार के रूप में प्रकट होकर उनके लिए ही कष्ट का सबसे बड़ा साधन बनता है !
अतः यदि हम चाहते हैं की भाई -बहिन के बीच स्नेह रहे, यदि हम चाहते हैं की हमारी संतानें सुखी पारिवारिक जीवन व्यतीत करें, यदि हम चाहते हैं की पुत्र वधुएँ परिवारजनों का आदर करें, उनकी सेवा करें, तो हमें इस विनाशकारी बुराई से मुक्त होना ही पड़ेगा ! दहेज़ मांगने की परम्परा का परित्याग करना पड़ेगा ! तभी समाज में वास्तविक सामाजिकता का विकाश होगा ! समाज, व्यक्ति तब शोषक नहीं कहलायेगा, लोगों में समाज के प्रति स्नेह उत्पन्न होगा व सामाजिक गतिविधियों में लोगों की रूचि पैदा होगी ..!!
लेखक :- आदरणीय श्री देवीसिंह जी महार
पुस्तक :- क्षत्राणी ,संस्करण -4 (कुवंर आयुवान सिंह जी हुडील स्मृती संस्थान , जयपुर)

2 comments:
अछी जानकारी दी आपने ! आज राजपूत युवा को आगे आकर अपनी जिमेदारी लेनी होगी तभी अपने समाज से यह बुराई को ख़त्म हो पायेगी
मेरे ब्लॉग मे भी पधारो सा
http://nimbijodhan.blogspot.in/
श्री देवीसिंह जी महार द्वारा लिखी पुस्तक "क्षत्राणी" पढ़ने के लिए इस लिंक को खोले
http://www.kshatranee.blogspot.in/2015/08/blog-post_58.html?m=1
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