Thursday, 17 September 2015

रक्षक देवता सदाशिव पुत्र श्री कलि गणेश l

सदाशिव पुत्र और हमारे रक्षक देवता श्री कलि गणेश जी का यह चित्र गणेश जी के परम धाम गढ़ रणथम्भोर में स्थापित प्रतिमा का ही है और मूल गणेश पुराण में वर्णित गणेश वंदना के आधार पर भी यही है। जिनका मन्त्र इस प्रकार है 

" ॐ शवेतास्व संस्थाय सितान्गधर्त्रे, क्षत्र वृतायासि लसत्कराय !
पीतांशुकाय द्विभुजान्विताय, धूम्र ध्वजायास्तु कलौ नमस्ते!!"

अर्थ -सफेद घोडे पर विराजमान है बर्फ के जैसे रंग के अंग है जिन्होने क्षात्र धर्म पालन का व्रत धारण कर रखा है जिनके एक हाथ मे तलवार शोभायमान है । पिताम्बर यानि पीले वस्त्र पहने हुए है दो भुजाओ वाले ,धुम्र {श्वेत बादल जैसी } वर्ण कि ध्वजा वाले, कलयुग के गणेश जी आपको प्रणाम करता हू ।

चारो युगो के गणेश अलग अलग होते है-
1-सतयुग -10 भुजा सिह सवारी
2-त्रेता युग - 6 भुजा , मोर सवारी
3-द्वापर युग - 4 भुजा सिन्दुर के समान रग , चुहा सवारी
4-कलयुग - 2 भुजा , सफेद घोडा सवारी ।
द्वापर के गणेश जी के भी न सुण्ड थी, न तोन्द थी, न हाथी का सर था ।

विघ्नहर्ता,मंगलकर्ता आप सब के जीवन में नूतन उत्साह का संचार करे समस्त विपत्तियों से आप सबकी और आपके परिवार की रक्षा करे...श्री गणेश भगवान हमें सारी बुराइयो से दूर रख कर आप हमें अपने चरणों में स्थान देवे ।
सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई एव शुभकामनाए ..
श्री गणेश रिद्धि सिद्धि के साथ आपके घर विराजे..
आपने और आपका सगला परिवार ने गणेशचतुर्थी री घणी घणी शुभ कामनाएँ सा।। 

Monday, 18 May 2015

रक्षक देवता सूर्य पुत्र शनि l

हमारे रक्षक देवता सूर्य पुत्र शनि देव की आज जयंती है सभी को ढेर सारी शुभकामनाये सा l

ॐ नीलधुतिं शुलधरंम किरिटनम ग्रधस्थित त्रासहरम धनुर्धरम् l
चतुर्भुजम सुर्यसुतम प्रशान्तं वन्दे सदा अभिस्टकरम वरेण्यम ll

सूर्य पुत्र शनि देव से प्रार्थना है आप सब सुख- समृद्धिवान हो , कीर्तिवान हो , यशवान हो, आयुष्मान हो , स्वस्थ्य रहे, आपके जीवन का हर पल खुशियों से भरपूर रहे l जीवन के प्रत्येक क्षण आप प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे , आपकी कीर्ति की पताका निरंतर फहराती रहे l

आदित्य च सोमाय मंगलाय बुधायाचा l गुरु शुक्र शनिभ्याच राहुवे केतुवे नमः
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् l छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ll

हे शनि देव आप, हम सब की मानवीय अभिलाषाओं की पूर्ति में मार्ग दर्शन करते रहे l

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् l



Monday, 30 March 2015

सत्यम वद, धर्मंम चर

महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को संकल्प द्वारा बला व अति बला नाम की विधाएं प्रदान की गई जिनके द्वारा कभी नष्ट न होने वाला ज्ञान व कभी कलांत न होने वाला शारीरिक बल उन्हें मिला | इसके अलावा और भी अनेक प्रकार के शास्त्र व अस्त्र - शास्त्र की विधाएं संकल्प द्वारा विश्वामित्र जी ने श्री राम व लक्ष्मण को प्रदान की |


भगवान् कृष्ण द्वारा भी अर्जुन की रणक्षेत्र की मध्य में कुछ ही समय में वह दिव्य ज्ञान प्रदान किया गया ,जिससे अर्जुन शोक मुक्त होकर क्षात्र धर्म का पालन करने को तैयार हो सका |

हृदय के उदघाटन व प्राण के द्वारा प्राण से संसर्ग , ज्ञान का बीजारोपण व विद्याओं का आदान प्रदान , यह क्षत्रिय परम्परा रही है | जिसको केवल हृदयगत साधना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है |

पंडावादी तत्वों द्वारा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने व क्षत्रियों को उनके परम्परागत ज्ञान से विमुख करने के उद्देश्य से पुराणवादी ग्रंथों द्वारा यह प्रचार किया गया कि क्षत्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई है |

जिस हृदय में परमात्मा का स्वरूप स्वयं आत्मा निवास करती है | उससे मुख कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता | अतः अगर मुख से उत्पन्न होने वाले तत्वों को अपने आपको जगदगुरु सिद्ध करना हो तो उसके लिए यह आवश्यक था कि वे क्षात्र तत्व की श्रेष्ठता को लोगों की आँखों से ओझल करे |

इसलिए सारे पुराणवादी ग्रन्थ व आधुनिक पंडावादी विद्वान तक एक स्वर से यह घोषणा करते है कि बाल्मीकि रामायण झूंठी है ! झूंठी है ! झूंठी है !!!

जिन लोगों ने इतने धार्मिक ग्रंथो को नष्ट किया व उनमे परिवर्तन किया | उनकी नजरों से व कारगुजारियों से बाल्मीकि रामायण किस प्रकार से अछूती रह गई, यह भी आश्चर्यजनक बात है |

इस संदर्भ में बाल्मीकि रामायण के बाद हमे श्रेष्ठ ग्रन्थ महाभारत के बारे में भी थोड़ा विचार करना होगा |
यद्यपि यह ग्रन्थ पंडावादी कार गुजारियो से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा | इसमें जो थोड़े पतिवर्तन किये गए है , उनकी उपेक्षा कर दी जाए तो इस ग्रन्थ को भी बाल्मीकि रामायण की तरह संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में माना जायेगा |

महाभारत ग्रन्थ कि रचना महर्षि वेदव्यास ने की है , जबकि पंडों का कथन यह है कि पुराणों कि रचना भी व्यास जी द्वारा ही की गई है | जिसे कोई भी व्यक्ति , जिसने इन ग्रंथों को पढ़ा है , उसे स्वीकार नहीं कर सकते , बाल्मीकि रामायण में जितनी कथाओं का वर्णन आता है , पुराणों में उन कथाओं में उलट दिया गया है , जिससे रामायण को झूंठा साबित कर सके |

इसके अतिरिक्त महाभारत व पुराणों के विचार व तर्क भी एक दुसरे से मेल नहीं खाते | इससे यह स्पष्ट हे की पंडावादी पुराणों के रचनाकारों ने व्यास जी के नाम का दुरुपयोग करने की चेष्टा हे , जो अक्षम्य अपराध है |

इस बात को आधुनिक विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में स्वीकारा है की महाभारत की कुछ ऋचाओं को बदला गया है और कुछ कथाएं जोड़ दी गई है |
रामायण के रचनाकार बाल्मीकि जी के आश्रम में बनवास के समय श्री राम , लक्ष्मण व सीताजी दस वर्ष तक रहे |
इसके बाद कम से कम १६ वर्ष तक सीताजी लव कुश के साथ , उनके आश्रम में रही लेकिन बाल्मीकि जी ने अपने साथ वार्तालाप का कोई प्रसंग रामायण में नहीं दिया |
इससे स्पष्ट हे की महाभारत में व्यास जी के कथन के रूप में जो कथाएं कही गई है | वह बाद में जोड़ी गई है |
इसी प्रकार वैशम्पायन जी व जनमेजय के बीच के संवाद भी बाद में जोड़े गए है |
पंडावादी ग्रन्थों में विश्वामित्र जी के बारे में अनेक मन घडन्त कथाएं उनके चरित्र को आवश्यकता से अधिक उभारने की चेष्टा की है |

इन ग्रन्थ में परशूराम जी से सम्बन्धित प्रसंग भी आये है , अतः उन्हें भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता !!!

Wednesday, 24 December 2014

क्षत्रिय का अर्थ जरुर जाने....

क्षत्रिय का अर्थ जरुर जाने सा !

क्षत्रिय का अर्थ होता है ईश्वर द्वारा निर्मित समस्त सृस्टि का रक्षण करने वाला ऐसा मनुष्य जिसके हृदय में स्वयं भगवान विराजित होकर सभी जन को क्षय से त्राण दिलवाते हो l

क्षत्रिय को ना नात का बंधन है ना जात का. क्षत्रिय प्रजा का पालक पिता है, जो इस धरती पर ईश्वर की उपस्थिति का हर समय प्रमाण देता है ।

इतने महान् क्षत्रिय गुणों का स्वामी अपने आप को धर्म से अलग कैसे कर सकता है ? 

टूटते और छिन्न भिन्न होते हुए शास्वत सनातन को कैसे देख सकता है ? जब कि धर्म के लिए ही क्षत्रिय की उत्पति इस धरा पर हुई है l
https://www.facebook.com/kshatradharam

Saturday, 22 June 2013

जप महिमा

http://www.facebook.com/bhanwarsarathore


जप महिमा 


जप क्या नहीं कर सकता ? जप दुःखियों का दुःख मिटा सकता है, रोगियों के रोग मिटा सकता है, अभक्त को भक्त बना सकता है, मुर्दे में प्राणों का संचार कर सकता है।

जप एक ऐसी निरंतर चलने वाली साधना या परम्परा थी जिसका पालन हमारे पूर्वज करते आ रहे थे लेकिन आज के आधुनिक और साक्षर युग में हमने इस कालजयी परम्परा को लुप्त कर या भुला दिया है, जिससे क्षात्र तत्व का ह्वास व नये नये दुर्गुणों व बुराइयों से घिर गए है, इसी की वजह से क्षत्रिय सत्त्ताच्युत होकर शुद्र्तत्व की भांति आम आदमी का जीवन यापन कर रहे है। 


पूर्वकाल में अपने पिता द्वारा अपने पुत्र व पति के द्वारा अपनी पत्नी को मंत्र या नाम जप की दीक्षा दी जाती थी जिसका वे ताउम्र पालन करते थे। 

कलियुग में भी जप सर्वोपरि है। भगवान श्री राम ने अहिल्या का उद्धार किया। लेकिन राम जी के नाम जप ने तो करोड़ों लोगों का उद्धार करने का काम का किया है। 

भ्रमर (भँवरा ) एक चेतना युक्त कीड़े को लगातार भ्रमर (जप) द्वारा प्राण डालकर अपने जेसा ही कीट बना देता है। 

नारदजी पिछले जन्म में विद्याहीन, जातिहीन, बलहीन दासीपुत्र थे। साधुसंग और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से वे आगे चलकर देवर्षि नारद बन गये। साधुसंग और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से ही कीड़े में से मैत्रेय ऋषि बन गये।
हम देखेंगे की हमारे आस पास में भी अनेक जप के प्रभाव से ही क्षत्रियो मे सती व झुंझार हुए है जिन्होंने अपना मस्तक कटवाने के बाद भी वीरता पूर्वक युद्ध किया है।
जप करने से क्या होता है? या भगवन्नाम के जप से क्या फायदा होता है? कितना फायदा होता है ? 
इसका पूरा बयान करने वाला कोई वक्ता पैदा ही नहीं हुआ और न होगा लेकिन फिर भी इसके कुछ निम्न फायदे आप जरुर ले और उठा सकते है.-

जप व मंत्र के विज्ञान को समझें। मंत्र का सृजन यह ध्यान में रखकर किया जाता है कि जप मंत्र की ध्वनियों का उच्चारण किस स्तर का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है और उसका जपकर्ता पर, बाहरी वातावरण पर तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? वस्तुत: जप से:-

(1) शरीर में स्थित चक्रों, उपत्यकाओं एवं ग्रंथियों की सामर्थ्य बढ़ती है।
(2) व्यक्ति में भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता विकसित होती है।
(3) जप से क्षत्रिये का तीसरे गुण तेज में वृद्धि होती है व इसके द्वारा शक्ति, शांति, लंबी आयु, यश व अलौकिक क्षमताएं प्राप्त होती है।
(4) लगातार जप करने से ध्वनि के प्रभावोत्पदक चेतन तत्व जहां भी टकराते हैं, वहां चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं।
(5) मंत्र जप की दोहरी प्रक्रिया होती है-एक भीतर और दूसरी बाहर। लगातार जप एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है जिससे सूक्ष्म शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होते है। चेतना में परिवर्तन होता है।
(6) जप और ध्यान के मेल से मानसिक शक्तियां सिमटने लगती है। उनका बिखराव बंद हो जाता है।
(7) कभी-कभी मन, जप करते-करते अचेतन की किसी बात में रमने लगता है। भटक जाता है। तब ऐसे विचार उठने लगते है जिन पर ग्लानि होने लगती है। ऐसी अवस्था में भटकें नहीं निराश न हों, बल्कि मन की इस उछलकूद को नजर अंदाज करें। अपने आत्मतत्व पर विचार करने लगे। मन शांत होता चला जाएगा।
(8) जप से आत्मतेज बढ़ता है। उसकी प्रचंडता के कषाय-कल्मषों का नाश होता है और इसकी ऊर्जा से दैवीय तत्वों का विकास होता है।
(9) विश्वामित्र जी ने गायत्री मंत्र को रचा, इस सूर्य मंत्र (गायत्री छन्द) के जप से मस्तिष्क का ऐसा परिमार्जन हो जाता है कि कुछ समय पहले जो बाते अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण लगती थी, वे पीछे अनावश्यक और अनुपयुक्त लगने लगती है।
(10) जप के द्वारा ऐसे अज्ञात परिवर्तन होते हैं जिनके कारण दुख और चिंताओं से ग्रस्त मनुष्य थोड़े ही समय में सुख-शांति का जीवन बिताने की स्थिति में पहुंच जाता है।
(11) संकट के समय में विपदाओं को हल करने का रास्ता सूझने लगता है।
(12) साधक का आपा इतना ऊंचा उठ जाता है कि आत्म साधना अपने आप पूरी होने लगती है।
(13) हम उत्कृष्ट जीवन जीने और अपना आत्म परिष्कार करने के लिए जप करें।
(14) जप का तत्व दर्शन हमारे जीवन का अंग बन जाए, वह विचारो और कार्यों में झलकने लगे। यही जप की सार्थकता है।
(15) थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। 
(16) नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।
(17) सबसे खास, लगातार या अनवरत जप से प्राण का मुह आत्मा की तरफ हो जाता है व इससे प्राण तत्व जागृत, वृद्धि व मजबूत होता है।

जप में हम कुछ भी जप सकते है चाहे वह भगवान का नाम हो, मंत्र हो , या कुछ और बात यह है की हर समय उठते, बैठते, सोते, जागते अपने अंतर्मन में हर वक्त जप करते रहना ही चाहिये।

काम करते रहो नाम जपते रहो 
पाप की वासनाओं से बचते रहो

इसी प्रकार "ॐ" भी केवल एक पवित्र ध्वनि ही नहीं, अपितु अनंत शक्ति का प्रतीक है। ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है । अ उ म् । "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना , "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना । ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है । 

ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है । मात्र ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई । इस प्रकार ॐ रूपी मंत्र का जो जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

नामधन का खजाना बढ़ाते रहो
हरे राम हरे कृष्ण गाते रहो

हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥

हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥


Sunday, 16 June 2013

"स्वधर्म का ज्ञान आवश्यक है "

"स्वधर्म का ज्ञान आवश्यक है "


मनुष्य सदेव ही दूसरे को जानने में लगा रहता है | वह दूसरे के ज्ञान ,दूसरे के धन दूसरे के मान-सम्मान,दूसरे की कार्य प्रणाली ,दूसरे का चाल-चलन और यहाँ तक कि अपना सारा जीवन दूसरे के मन और जीवन को ताकने में लगा देता है |वह सदेव कुछ लोगो की प्रशंसा और कुछ की निन्दा करने में अपना अमूल्य जीवन ,समय और धन व्यतीत करता रहता है |परिणाम होता है उसे केवल शून्य हाथ लगता है, अर्थात उसका सारा प्रयास निरर्थक जाता है क्योंकि ,किसी दूसरे के मन कि थाह लगाना तो अँधेरे में भटकने जैसा है | जितना परिश्रम मनुष्य दूसरे को जानने में करता है यदि उसका थोडासा प्रयत्न भी स्वयं को जानने में कर ले तो निश्चित ही वह अपने को जानने लगेगा |वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य स्वयं को उतना भी नहीं जानपता जितना कि वह दूसरो को जान लेता है, परिणाम होता है कि वह सदेव ऐसा कार्य करता है जो स्वयं उसके अहित का होता है |गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा है कि "मनुष्य स्वयं ही स्वयं का शत्रु है और स्वयं ही स्वयं का हितेषी भी " |अर्थात हमारे सुख दुःख का कारण कदापि कोई और नहीं होता बल्कि हम स्वयं अपने ही कर्मो के परिणाम स्वरूप फल प्राप्त करते है |जैसा बीज किसान खेत में बोता है, वैसी ही फसल भी प्राप्त करता है |चूँकि हम कभी भी अपने को जानने का प्रयत्न नहीं करते तो फिर हम अपनी हर स्थिति के लिए दोष भी दूसरे को हो देना उचित समझते है |आपको ऐसे बहुत से लोग रोते हुए मिलेंगे जो अपनी हर असफलता के पीछे किसी न किसी और को उत्तरदायी ठहराया करते है |उसका परिणाम भी तुरंत मिलता है ऐसे लोग कभी उन्नति के मार्ग का परिचय नहीं प्राप्त कर पाते है |अब आप यह मानिये कि दूसरे लोग तो एक उपकरण या साधन की भांति है, जो न बुरे है न अच्छे ,अब यह तो उनके उपयोग कर्ता पर निर्भर है न कि वह उससे हानि उठाये या कि लाभ .,,,,,,इस संसार में बिष का अपना महत्व है और अमृत का अपना ,यदि आप बिष-पान करके यह दोष बिष पर मढ़े कि बिष ने हमारी जान लेली तो क्या बिष स्वयं आप के मुहं में आया था ????? 

कदापि नहीं ,,,,दरसल जब हम दूसरे को जानने में लगते है तब हम परमुखापेक्षी होते है जबकि यदि हम स्वयं को जानने लगे तो फिर हम परमुखापेक्षी नहीं बल्कि स्वयं अपने को तौलते हुए हर कार्य करेंगे |तब हम पर दूसरे की करनी और रहन सहन ,उसके धर्म उसकी गतिविधियों का उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा जितना की आज हमारे जीवन में हावी है |अब हम हमेशा भयभीत रहते है कि हमारे अमुख कार्य का लोगो पर क्या प्रभाव पड़ेगा या लोग क्या कहंगे ? जबकि लोग क्या कहेंगे, उन्हें भी तो आप जैसा ही रोग लगा है कि हमारे कार्यो पर लोग क्या कहेंगे ?यानि आप कुछ भी करो उन्हें इस बात की फुर्सत ही नहीं की क्या कहे और क्या सोचे |क्योंकि जो स्वयं परामुखापेक्षी नहीं उन्हें तो आपके कार्यो पर नजर रखने की आदत ही नहीं और जिन्हें आदत है वे तो स्वयं ही डूबने वाली नाव पर सवार है इसलिए उनकी टिप्पणी कोई मायने ही नहीं रखती है |
अब बात उठती है कि तो आखिर हम करे क्या ????? 

यह सवाल अक्सर लोगो को सालता रहता है कि जी हम करे क्या ???

यह सवाल ही इस बात का धोतक है कि वास्तव में हम कुछ करना ही नहीं चाहते बल्कि कर्म करने से बचने के लिए किसी तर्क की ढाल की खोज करना चाहते है |यह अटल सत्य है कि हमारे जन्म और मृत्यु पर निसंदेह हमारा बस नहीं है |यह निश्चित रूपसे सृष्टि की किसी वैज्ञानिक और अध्यात्मिक प्रक्रिया का परिणाम मात्र है |जब हमारे जन्म पर हमारा अधिकार नहीं तो फिर हमारे स्व-धर्म पर भी हमारा अधिकार नहीं होसकता है |यह भी निश्चित रूप से पहले से ही निर्धारित होचुका होगा | जब हमारा स्व-धर्म पहले से ही निर्धारित है तो उसे चुनने का तो हमे अधिकार नहीं है| क्योंकि हम या तो नास्तिक हो सकते है या फिर आस्तिक ,दोनों एक साथ तो नहीं होसकते न ??? यदि हम आस्तिक है और यह मानते है कि ईश्वर या प्रकृति का कोई नियंत्रक है तो निश्चित रूपसे किसी प्राक्रतिक और अध्यात्मिक कारण से ही हमारा जन्म हमारे माता-पिता के घर हुआ है |जिस प्रकार हमें अपनी जननी और जनक को स्व-माता और स्व-पिता मानने में हर्ष और अनुकूलता महशूश होती है |वैसे ही स्वधर्म में अपने को समर्पित करने में अनुकूलता प्राप्त होती है | 

इसके लिए गीता के इन श्लोको का उदहारण यहाँ उचित होगा |

"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह : !! 35!! तीसरा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है | अपने धर्म का पालन करते हुए तो मरना भी कल्याणकारक है ,जबकि दूसरे का धर्म तो भय को देने वाला होता है |

"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम !!४७!!अठारहवा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है | स्वभाव से नियत किये हुए कर्म अर्थात वर्नाधार्मानुसार नियत कर्म कर्ता हुआ ,मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता है |

"सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत !
सर्वारम्भा हि दोषेण धुमेनाग्निरिवावृता !!४८!!अठारहवा अध्याय

हे अर्जुन दोषयुक्त भी जन्म के साथ उत्पन स्वधर्म को नहीं त्यागना चाहिए ! निश्चित ही धुवाँ से अग्नि की भांति सभी कर्मो का आरंभ तो दोष से ढका हुआ है !

अब हम जिस वर्ण में पैदा हुए है उसके अनुसार हमारा जो भी कर्म है ,वास्तव में यही हमारा स्वधर्म है और इसका ज्ञान हमारे लिए अति आवश्यक है | हम स्वधर्म के बिना जी भी सकते है, किन्तु वह जीवन सफल नहीं कहा जासकता ठीक वैसे ही जिस प्रकार अपनी जननी के बगेर बालक का पालन पोषण हो तो जाता है ,किन्तु स्वमाता तो आखिर स्व-माता ही होती है |विमाता भले ही कितना ही ऊँचे दर्जे का स्नेह और ममता से पालन करले किन्तु शिशु में जो पालन अपनी जननी के द्वारा होता है उसकी तुलना तो नहीं ही की जासकती न !

इसलिए हम सभी का यह परम कर्तव्य है की हम सर्वप्रथम अपने धर्म को पहिचाने जो निश्चित है और उसका ज्ञान प्राप्त करे ताकि हमारा जीवन सार्थक होसके |

"जय क्षात्र-धर्म "


Friday, 26 April 2013

क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षत्रिय राजपूत का स्वधर्मः-

यानी क्षत्रिय जाति नहीं धर्म है और पूजा नहीं कर्म है.
भारत की सभ्यता अति प्राचीन मानी जाती है। यह युगों-युगों से अनेक उत्थान-पतन की परिस्थितियों से गुजर चुकी है। हमनें उनसे प्रेरणाऐं भी लीं और सबक भी सीखे। यह मानवतावादी, विश्ववादी, न्याय प्रेम करुणा का देश धर्म एवं जाति प्रधान है। यह देश बाहरी दुनिया के अनेक कौमों का राजनैतिक, आर्थिक गुलाम तो रहा लेकिन इसकी मूल आत्मा जो संस्कृति एवं आध्यात्म में थी इसलिए इसका अस्तित्व आज भी जिन्दा है लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद यह देश जिन यूरोपीय, अमेरिकी देशों की नीतियां अपनाकर अपने ही हाथ अपना आत्मघात कर रहा है, वे अब सहन नहीं की जा सकती है । यदापि यूरोपीय नीतियों के सदियों पुराने प्रभाव से एक बहुत बड़ा वर्ग उसका प्रवक्ता बन गया है। ऐसे लोग केवल आर्थिक लाभ के लिए स्वयं ही गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज भी एक उपेक्षित क्षत्रिय बुद्धिजीवी वर्ग इन यूरोपीय नीतियों का घोर विरोधी है जो शक्ति हीनता के कारण लड़ने में सक्षम नहीं है। उसे नई शक्ति देने के लिए भारत की एक विशिष्ट राजनैतिक जाति क्षत्रिय राजपूत राष्ट्र और विश्व को धर्म, संस्कृति और राजनीति को नई दिशा देने के लिए जन्म ले रही है। अधोगति प्राप्त राजनैतिक चेतना से शून्य समाज में उपेक्षित तथा आजादी के बाद हर तरफ से पीडि़त इस महान जाति को एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए जागृत करने और अपनी परंपरा के अनुसार देश धर्म के लिए बलिदान देने के लिए तैयार करने का यह छोटा सा प्रयास है। जिस प्रकार कभी विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध आज के पंजाब प्रदेश की महान बलिदानी जातियों जाटों, सिक्खों, राजपूतों को गुरुओं ने अपना बलिदान देकर बलिदान देने के लिए तैयार किया था। जब-जब इस देश में जाति और धर्म के नाम पर अन्याय, अत्याचार हुए तब-तब इसी जाति में युग पुरुष पैदा हुए जैसे-भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह आदि जिन्होंने मानव जाति को अन्याय अत्याचार से मुक्त कराया। हमें पुनः एक बार इस विकृत जाति एवं पंथवाद से मुक्त वेदान्त पर आधारित विश्व की पुर्नरचना के लिए इन जातियों और पंथों को मानवता की ओर मोड़ना होगा और अपने राष्ट्र तथा विश्व के अनेक धर्मों के साथ समन्वय स्थापित करना होगा।
वर्ण विज्ञान के अनुसार क्षत्रिय शक्ति का प्रतीक है। शक्ति के बिना ज्ञान नपुंसक है। दुर्भाग्य से भारत एक हजार वर्ष से शक्तिहीन हो गया है। इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है, हम स्वयं ही हैं। इसलिए पुनः शक्तिवान बनने के लिए किसी दूसरे की ओर नहीं देखना है। सिर्फ अपने क्षत्रिय धर्म का आचरण करना है। जब आप क्षत्रिय धर्म का पालन करेंगे तो सम्पूर्ण समाज आपको नेतृत्व भी सौपेंगा। धर्म और वर्ण धर्म के उदय का पूर्ण अवसर आ गया है। जो इसको पहचानेंगे और छात्र धर्म का आचरण करेंगे वे समाज में अपना स्थान बनायेंगे। जो युग धर्म नहीं पहचानेंगे, वे पिछड़ जायेंगे और स्वयं दलित हो जायेंगे। क्षत्रिय केवल सामान्य मानव नहीं बल्कि विशिष्ट मानव के रूप में पहचाने जाते हैं इसलिए हमें अपने राष्ट्रीय मानव कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। हमें अपनी शक्ति को राष्ट्रहित में लगाने की तैयारी करनी है। अपनी युवा शक्ति को ज्ञान एवं शक्ति से सम्पन्न बनाकर प्रशिक्षित करना है ताकि ये अपने स्वधर्म का पहचाने।
भोग परायण संस्कृति के विरुद्ध आम आदमी जो शोषण और दमन का शिकार हो रहा है के लिए क्षत्रियों को आगे आना होगा इससे पूरा विश्व छात्र धर्म को समझेगा और मानवता को शोषण से मुक्ति मिलेगी। आज क्षत्रिय राजनैतिक आर्थिक अधिकारों से भी वंचित है और संख्या की राजनीति में शक्तिहीन हो गये हैं। इसके अलावा क्षत्रियों के अस्तित्व पर राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक हमले हो रहे हैं। इससे क्षत्रिय शक्तिहीन एवं प्रतण्डित हो रहा है। राष्ट्र को रक्षा करने वाले ही यदि स्वयं शक्तिहीन हो जायेंगे तो समाज की रक्षा कौन करेगा। इसलिए जागो, उठो और अपनी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान की तैयारी करो। किसी कौम के सामने जब ऐसे संकट खड़े होते हैं तब या तो वो हमेशा के लिए दासत्व स्वीकार कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेती है अथवा इन चुनौतियों का जबाव देने के लिए फिर उठ खड़ी होती है। आज क्षत्रियों को पुनः उठ खड़ा होना है या अपने कुल, गौरव, मान मर्यादाओं एवं संस्कृति को छोड़कर नष्ट हो जाना है।
हम अपना एक नया इतिहास बना सकते हैं हमें सदैव आशावादी होना चाहिए। निराशा का नाम ही मृत्यु है यह किसी भी व्यक्ति अथवा समाज पर लागू होती है। हमें अन्तर्राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा द्वारा चलाये जा रहे मिशन राजपूत इन एक्शन के इस संघर्ष में अपने सजातीय बुद्धिजीवियों को मार्गदर्शन तथा व्यापारियों का आर्थिक सहयोग लेना है यही युगधर्म है।
वर्तमान युग परिवर्तन की घड़ी में क्षत्रियों को अपना राष्ट्रीय और मानीवय कर्तव्य समझना होगा। इतिहास और महापुरुषों से प्रेरणा लेनी होगी। हमारे यहां आदिकाल से लोक कल्याणकारी राजतन्त्र रहा है। उसकी अपनी मर्यादाऐं थीं। जिसे सामन्ती युग कहते हैं उस सामन्त शब्द का जन्म विदेशी बर्बर कौमों के गुलामी के काल में हुआ। सामन्त शब्द पश्चिम की देन है जब तक समाज रहेगा समाज की व्यवस्था के लिए एक संचालन सूत्र रहेगा। भारत के अतीत का समाज विज्ञान पूर्ण और धर्म आधारित है। इसीलिए हमें अपने अतीत मानव कल्याणकारी क्षत्रिय वर्ण धर्म के पुर्नउत्थान साहसपूर्वक अपने विचारों को जगत में रखना चाहिए। आधुनिक भारत में क्षत्रियों को छात्र धर्म अपनाना होगा यदि क्षत्रियों ने अपना स्वधर्म अपना लिया तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो राज्य व्यवस्था का संचालन सूत्र उनके हाथ से छीन सके। इतिहास में भगवानों के रूप में जिनकी पूजा हुई और हो रही है वे सब क्षत्रिय पुत्र ही हैं। बोद्ध और जैनों ने तो भावी युगों के लिए यह कहा है कि आगे आने वाले युगों में क्षत्रियों में ही भगवान बुद्ध और महावीर आयेंगे। आधुनिक युग के संदर्भ में पृथ्वीराज चैहान, राणा प्रताप, शिवाजी, दुर्गादास राठौर, गुरु गोविन्द सिंह जैसे क्षत्रिय आयेंगे। इतनी महान ऐतिहासिक पूंजी के वारिस अपने क्षत्रिय धर्म को पहचानें । भारत और विश्व जननी भारत माता की निगाहें इसी क्षत्रिय पुत्र के अवतरण की प्रतीक्षा कर रही हैं।
विराट क्षत्रिय समाजः-
वे सब सैनिक जातियां जो अपने आर्थिक पिछड़ेपन के कारण पिछड़े वर्ग में आती हैं वे सब जातियां जिनका चरित्र लड़ाकू है और जिनके राज्य भी रहे हैं विराट क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग है लेकिन ऐतिहासिक तथा आर्थिक कारणों से हम टूट गये हैं। हमको पुनः एकीकरण के लिए काम करना होगा स्मरण रहे कि इतिहास ने हमारे अनेक भाईयों को हमसे अलग किया है। हमें हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने गले लगाना होगा तभी हमारी शक्ति बनेगी यदि वे सभी क्षत्रिय जातियां संगठित हो जायें तो क्षत्रिय संख्या की दृष्टि से भी शक्तिशाली हो जायेंगे। यदि क्षत्रिय शक्ति संघर्ष करे तो ये वर्ण अपने खोये हुए स्थान को पुनः प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि अभी तक यह वर्ग पश्चिम के वैचारिक हथियारों से लड़ते रहे हैं। इसलिए विफल भी रहे हैं। अब ये शक्तियां जागृत हो रही हैं और वह अपने भारतीय विचारों के हथियारों से लड़ने को तैयार है। आयुवान सिंह स्मृति संस्थान द्वारा चलाई जा रही विचार क्रांति इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानव कल्याण के लिए हितकर सिद्ध होगी ।