महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को संकल्प द्वारा बला व अति बला नाम की विधाएं प्रदान की गई जिनके द्वारा कभी नष्ट न होने वाला ज्ञान व कभी कलांत न होने वाला शारीरिक बल उन्हें मिला | इसके अलावा और भी अनेक प्रकार के शास्त्र व अस्त्र - शास्त्र की विधाएं संकल्प द्वारा विश्वामित्र जी ने श्री राम व लक्ष्मण को प्रदान की |
भगवान् कृष्ण द्वारा भी अर्जुन की रणक्षेत्र की मध्य में कुछ ही समय में वह दिव्य ज्ञान प्रदान किया गया ,जिससे अर्जुन शोक मुक्त होकर क्षात्र धर्म का पालन करने को तैयार हो सका |
हृदय के उदघाटन व प्राण के द्वारा प्राण से संसर्ग , ज्ञान का बीजारोपण व विद्याओं का आदान प्रदान , यह क्षत्रिय परम्परा रही है | जिसको केवल हृदयगत साधना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है |
पंडावादी तत्वों द्वारा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने व क्षत्रियों को उनके परम्परागत ज्ञान से विमुख करने के उद्देश्य से पुराणवादी ग्रंथों द्वारा यह प्रचार किया गया कि क्षत्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई है |
जिस हृदय में परमात्मा का स्वरूप स्वयं आत्मा निवास करती है | उससे मुख कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता | अतः अगर मुख से उत्पन्न होने वाले तत्वों को अपने आपको जगदगुरु सिद्ध करना हो तो उसके लिए यह आवश्यक था कि वे क्षात्र तत्व की श्रेष्ठता को लोगों की आँखों से ओझल करे |
इसलिए सारे पुराणवादी ग्रन्थ व आधुनिक पंडावादी विद्वान तक एक स्वर से यह घोषणा करते है कि बाल्मीकि रामायण झूंठी है ! झूंठी है ! झूंठी है !!!
जिन लोगों ने इतने धार्मिक ग्रंथो को नष्ट किया व उनमे परिवर्तन किया | उनकी नजरों से व कारगुजारियों से बाल्मीकि रामायण किस प्रकार से अछूती रह गई, यह भी आश्चर्यजनक बात है |
इस संदर्भ में बाल्मीकि रामायण के बाद हमे श्रेष्ठ ग्रन्थ महाभारत के बारे में भी थोड़ा विचार करना होगा |
यद्यपि यह ग्रन्थ पंडावादी कार गुजारियो से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा | इसमें जो थोड़े पतिवर्तन किये गए है , उनकी उपेक्षा कर दी जाए तो इस ग्रन्थ को भी बाल्मीकि रामायण की तरह संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में माना जायेगा |
महाभारत ग्रन्थ कि रचना महर्षि वेदव्यास ने की है , जबकि पंडों का कथन यह है कि पुराणों कि रचना भी व्यास जी द्वारा ही की गई है | जिसे कोई भी व्यक्ति , जिसने इन ग्रंथों को पढ़ा है , उसे स्वीकार नहीं कर सकते , बाल्मीकि रामायण में जितनी कथाओं का वर्णन आता है , पुराणों में उन कथाओं में उलट दिया गया है , जिससे रामायण को झूंठा साबित कर सके |
इसके अतिरिक्त महाभारत व पुराणों के विचार व तर्क भी एक दुसरे से मेल नहीं खाते | इससे यह स्पष्ट हे की पंडावादी पुराणों के रचनाकारों ने व्यास जी के नाम का दुरुपयोग करने की चेष्टा हे , जो अक्षम्य अपराध है |
इस बात को आधुनिक विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में स्वीकारा है की महाभारत की कुछ ऋचाओं को बदला गया है और कुछ कथाएं जोड़ दी गई है |
रामायण के रचनाकार बाल्मीकि जी के आश्रम में बनवास के समय श्री राम , लक्ष्मण व सीताजी दस वर्ष तक रहे |
इसके बाद कम से कम १६ वर्ष तक सीताजी लव कुश के साथ , उनके आश्रम में रही लेकिन बाल्मीकि जी ने अपने साथ वार्तालाप का कोई प्रसंग रामायण में नहीं दिया |
इससे स्पष्ट हे की महाभारत में व्यास जी के कथन के रूप में जो कथाएं कही गई है | वह बाद में जोड़ी गई है |
इसी प्रकार वैशम्पायन जी व जनमेजय के बीच के संवाद भी बाद में जोड़े गए है |
पंडावादी ग्रन्थों में विश्वामित्र जी के बारे में अनेक मन घडन्त कथाएं उनके चरित्र को आवश्यकता से अधिक उभारने की चेष्टा की है |
इन ग्रन्थ में परशूराम जी से सम्बन्धित प्रसंग भी आये है , अतः उन्हें भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता !!!
भगवान् कृष्ण द्वारा भी अर्जुन की रणक्षेत्र की मध्य में कुछ ही समय में वह दिव्य ज्ञान प्रदान किया गया ,जिससे अर्जुन शोक मुक्त होकर क्षात्र धर्म का पालन करने को तैयार हो सका |
हृदय के उदघाटन व प्राण के द्वारा प्राण से संसर्ग , ज्ञान का बीजारोपण व विद्याओं का आदान प्रदान , यह क्षत्रिय परम्परा रही है | जिसको केवल हृदयगत साधना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है |
पंडावादी तत्वों द्वारा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने व क्षत्रियों को उनके परम्परागत ज्ञान से विमुख करने के उद्देश्य से पुराणवादी ग्रंथों द्वारा यह प्रचार किया गया कि क्षत्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई है |
जिस हृदय में परमात्मा का स्वरूप स्वयं आत्मा निवास करती है | उससे मुख कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता | अतः अगर मुख से उत्पन्न होने वाले तत्वों को अपने आपको जगदगुरु सिद्ध करना हो तो उसके लिए यह आवश्यक था कि वे क्षात्र तत्व की श्रेष्ठता को लोगों की आँखों से ओझल करे |
इसलिए सारे पुराणवादी ग्रन्थ व आधुनिक पंडावादी विद्वान तक एक स्वर से यह घोषणा करते है कि बाल्मीकि रामायण झूंठी है ! झूंठी है ! झूंठी है !!!
जिन लोगों ने इतने धार्मिक ग्रंथो को नष्ट किया व उनमे परिवर्तन किया | उनकी नजरों से व कारगुजारियों से बाल्मीकि रामायण किस प्रकार से अछूती रह गई, यह भी आश्चर्यजनक बात है |
इस संदर्भ में बाल्मीकि रामायण के बाद हमे श्रेष्ठ ग्रन्थ महाभारत के बारे में भी थोड़ा विचार करना होगा |
यद्यपि यह ग्रन्थ पंडावादी कार गुजारियो से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा | इसमें जो थोड़े पतिवर्तन किये गए है , उनकी उपेक्षा कर दी जाए तो इस ग्रन्थ को भी बाल्मीकि रामायण की तरह संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में माना जायेगा |
महाभारत ग्रन्थ कि रचना महर्षि वेदव्यास ने की है , जबकि पंडों का कथन यह है कि पुराणों कि रचना भी व्यास जी द्वारा ही की गई है | जिसे कोई भी व्यक्ति , जिसने इन ग्रंथों को पढ़ा है , उसे स्वीकार नहीं कर सकते , बाल्मीकि रामायण में जितनी कथाओं का वर्णन आता है , पुराणों में उन कथाओं में उलट दिया गया है , जिससे रामायण को झूंठा साबित कर सके |
इसके अतिरिक्त महाभारत व पुराणों के विचार व तर्क भी एक दुसरे से मेल नहीं खाते | इससे यह स्पष्ट हे की पंडावादी पुराणों के रचनाकारों ने व्यास जी के नाम का दुरुपयोग करने की चेष्टा हे , जो अक्षम्य अपराध है |
इस बात को आधुनिक विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में स्वीकारा है की महाभारत की कुछ ऋचाओं को बदला गया है और कुछ कथाएं जोड़ दी गई है |
रामायण के रचनाकार बाल्मीकि जी के आश्रम में बनवास के समय श्री राम , लक्ष्मण व सीताजी दस वर्ष तक रहे |
इसके बाद कम से कम १६ वर्ष तक सीताजी लव कुश के साथ , उनके आश्रम में रही लेकिन बाल्मीकि जी ने अपने साथ वार्तालाप का कोई प्रसंग रामायण में नहीं दिया |
इससे स्पष्ट हे की महाभारत में व्यास जी के कथन के रूप में जो कथाएं कही गई है | वह बाद में जोड़ी गई है |
इसी प्रकार वैशम्पायन जी व जनमेजय के बीच के संवाद भी बाद में जोड़े गए है |
पंडावादी ग्रन्थों में विश्वामित्र जी के बारे में अनेक मन घडन्त कथाएं उनके चरित्र को आवश्यकता से अधिक उभारने की चेष्टा की है |
इन ग्रन्थ में परशूराम जी से सम्बन्धित प्रसंग भी आये है , अतः उन्हें भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता !!!
