Saturday, 22 June 2013

जप महिमा

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जप महिमा 


जप क्या नहीं कर सकता ? जप दुःखियों का दुःख मिटा सकता है, रोगियों के रोग मिटा सकता है, अभक्त को भक्त बना सकता है, मुर्दे में प्राणों का संचार कर सकता है।

जप एक ऐसी निरंतर चलने वाली साधना या परम्परा थी जिसका पालन हमारे पूर्वज करते आ रहे थे लेकिन आज के आधुनिक और साक्षर युग में हमने इस कालजयी परम्परा को लुप्त कर या भुला दिया है, जिससे क्षात्र तत्व का ह्वास व नये नये दुर्गुणों व बुराइयों से घिर गए है, इसी की वजह से क्षत्रिय सत्त्ताच्युत होकर शुद्र्तत्व की भांति आम आदमी का जीवन यापन कर रहे है। 


पूर्वकाल में अपने पिता द्वारा अपने पुत्र व पति के द्वारा अपनी पत्नी को मंत्र या नाम जप की दीक्षा दी जाती थी जिसका वे ताउम्र पालन करते थे। 

कलियुग में भी जप सर्वोपरि है। भगवान श्री राम ने अहिल्या का उद्धार किया। लेकिन राम जी के नाम जप ने तो करोड़ों लोगों का उद्धार करने का काम का किया है। 

भ्रमर (भँवरा ) एक चेतना युक्त कीड़े को लगातार भ्रमर (जप) द्वारा प्राण डालकर अपने जेसा ही कीट बना देता है। 

नारदजी पिछले जन्म में विद्याहीन, जातिहीन, बलहीन दासीपुत्र थे। साधुसंग और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से वे आगे चलकर देवर्षि नारद बन गये। साधुसंग और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से ही कीड़े में से मैत्रेय ऋषि बन गये।
हम देखेंगे की हमारे आस पास में भी अनेक जप के प्रभाव से ही क्षत्रियो मे सती व झुंझार हुए है जिन्होंने अपना मस्तक कटवाने के बाद भी वीरता पूर्वक युद्ध किया है।
जप करने से क्या होता है? या भगवन्नाम के जप से क्या फायदा होता है? कितना फायदा होता है ? 
इसका पूरा बयान करने वाला कोई वक्ता पैदा ही नहीं हुआ और न होगा लेकिन फिर भी इसके कुछ निम्न फायदे आप जरुर ले और उठा सकते है.-

जप व मंत्र के विज्ञान को समझें। मंत्र का सृजन यह ध्यान में रखकर किया जाता है कि जप मंत्र की ध्वनियों का उच्चारण किस स्तर का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है और उसका जपकर्ता पर, बाहरी वातावरण पर तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? वस्तुत: जप से:-

(1) शरीर में स्थित चक्रों, उपत्यकाओं एवं ग्रंथियों की सामर्थ्य बढ़ती है।
(2) व्यक्ति में भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता विकसित होती है।
(3) जप से क्षत्रिये का तीसरे गुण तेज में वृद्धि होती है व इसके द्वारा शक्ति, शांति, लंबी आयु, यश व अलौकिक क्षमताएं प्राप्त होती है।
(4) लगातार जप करने से ध्वनि के प्रभावोत्पदक चेतन तत्व जहां भी टकराते हैं, वहां चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं।
(5) मंत्र जप की दोहरी प्रक्रिया होती है-एक भीतर और दूसरी बाहर। लगातार जप एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है जिससे सूक्ष्म शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होते है। चेतना में परिवर्तन होता है।
(6) जप और ध्यान के मेल से मानसिक शक्तियां सिमटने लगती है। उनका बिखराव बंद हो जाता है।
(7) कभी-कभी मन, जप करते-करते अचेतन की किसी बात में रमने लगता है। भटक जाता है। तब ऐसे विचार उठने लगते है जिन पर ग्लानि होने लगती है। ऐसी अवस्था में भटकें नहीं निराश न हों, बल्कि मन की इस उछलकूद को नजर अंदाज करें। अपने आत्मतत्व पर विचार करने लगे। मन शांत होता चला जाएगा।
(8) जप से आत्मतेज बढ़ता है। उसकी प्रचंडता के कषाय-कल्मषों का नाश होता है और इसकी ऊर्जा से दैवीय तत्वों का विकास होता है।
(9) विश्वामित्र जी ने गायत्री मंत्र को रचा, इस सूर्य मंत्र (गायत्री छन्द) के जप से मस्तिष्क का ऐसा परिमार्जन हो जाता है कि कुछ समय पहले जो बाते अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण लगती थी, वे पीछे अनावश्यक और अनुपयुक्त लगने लगती है।
(10) जप के द्वारा ऐसे अज्ञात परिवर्तन होते हैं जिनके कारण दुख और चिंताओं से ग्रस्त मनुष्य थोड़े ही समय में सुख-शांति का जीवन बिताने की स्थिति में पहुंच जाता है।
(11) संकट के समय में विपदाओं को हल करने का रास्ता सूझने लगता है।
(12) साधक का आपा इतना ऊंचा उठ जाता है कि आत्म साधना अपने आप पूरी होने लगती है।
(13) हम उत्कृष्ट जीवन जीने और अपना आत्म परिष्कार करने के लिए जप करें।
(14) जप का तत्व दर्शन हमारे जीवन का अंग बन जाए, वह विचारो और कार्यों में झलकने लगे। यही जप की सार्थकता है।
(15) थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। 
(16) नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।
(17) सबसे खास, लगातार या अनवरत जप से प्राण का मुह आत्मा की तरफ हो जाता है व इससे प्राण तत्व जागृत, वृद्धि व मजबूत होता है।

जप में हम कुछ भी जप सकते है चाहे वह भगवान का नाम हो, मंत्र हो , या कुछ और बात यह है की हर समय उठते, बैठते, सोते, जागते अपने अंतर्मन में हर वक्त जप करते रहना ही चाहिये।

काम करते रहो नाम जपते रहो 
पाप की वासनाओं से बचते रहो

इसी प्रकार "ॐ" भी केवल एक पवित्र ध्वनि ही नहीं, अपितु अनंत शक्ति का प्रतीक है। ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है । अ उ म् । "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना , "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना । ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है । 

ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है । मात्र ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई । इस प्रकार ॐ रूपी मंत्र का जो जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

नामधन का खजाना बढ़ाते रहो
हरे राम हरे कृष्ण गाते रहो

हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥

हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥


Sunday, 16 June 2013

"स्वधर्म का ज्ञान आवश्यक है "

"स्वधर्म का ज्ञान आवश्यक है "


मनुष्य सदेव ही दूसरे को जानने में लगा रहता है | वह दूसरे के ज्ञान ,दूसरे के धन दूसरे के मान-सम्मान,दूसरे की कार्य प्रणाली ,दूसरे का चाल-चलन और यहाँ तक कि अपना सारा जीवन दूसरे के मन और जीवन को ताकने में लगा देता है |वह सदेव कुछ लोगो की प्रशंसा और कुछ की निन्दा करने में अपना अमूल्य जीवन ,समय और धन व्यतीत करता रहता है |परिणाम होता है उसे केवल शून्य हाथ लगता है, अर्थात उसका सारा प्रयास निरर्थक जाता है क्योंकि ,किसी दूसरे के मन कि थाह लगाना तो अँधेरे में भटकने जैसा है | जितना परिश्रम मनुष्य दूसरे को जानने में करता है यदि उसका थोडासा प्रयत्न भी स्वयं को जानने में कर ले तो निश्चित ही वह अपने को जानने लगेगा |वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य स्वयं को उतना भी नहीं जानपता जितना कि वह दूसरो को जान लेता है, परिणाम होता है कि वह सदेव ऐसा कार्य करता है जो स्वयं उसके अहित का होता है |गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा है कि "मनुष्य स्वयं ही स्वयं का शत्रु है और स्वयं ही स्वयं का हितेषी भी " |अर्थात हमारे सुख दुःख का कारण कदापि कोई और नहीं होता बल्कि हम स्वयं अपने ही कर्मो के परिणाम स्वरूप फल प्राप्त करते है |जैसा बीज किसान खेत में बोता है, वैसी ही फसल भी प्राप्त करता है |चूँकि हम कभी भी अपने को जानने का प्रयत्न नहीं करते तो फिर हम अपनी हर स्थिति के लिए दोष भी दूसरे को हो देना उचित समझते है |आपको ऐसे बहुत से लोग रोते हुए मिलेंगे जो अपनी हर असफलता के पीछे किसी न किसी और को उत्तरदायी ठहराया करते है |उसका परिणाम भी तुरंत मिलता है ऐसे लोग कभी उन्नति के मार्ग का परिचय नहीं प्राप्त कर पाते है |अब आप यह मानिये कि दूसरे लोग तो एक उपकरण या साधन की भांति है, जो न बुरे है न अच्छे ,अब यह तो उनके उपयोग कर्ता पर निर्भर है न कि वह उससे हानि उठाये या कि लाभ .,,,,,,इस संसार में बिष का अपना महत्व है और अमृत का अपना ,यदि आप बिष-पान करके यह दोष बिष पर मढ़े कि बिष ने हमारी जान लेली तो क्या बिष स्वयं आप के मुहं में आया था ????? 

कदापि नहीं ,,,,दरसल जब हम दूसरे को जानने में लगते है तब हम परमुखापेक्षी होते है जबकि यदि हम स्वयं को जानने लगे तो फिर हम परमुखापेक्षी नहीं बल्कि स्वयं अपने को तौलते हुए हर कार्य करेंगे |तब हम पर दूसरे की करनी और रहन सहन ,उसके धर्म उसकी गतिविधियों का उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा जितना की आज हमारे जीवन में हावी है |अब हम हमेशा भयभीत रहते है कि हमारे अमुख कार्य का लोगो पर क्या प्रभाव पड़ेगा या लोग क्या कहंगे ? जबकि लोग क्या कहेंगे, उन्हें भी तो आप जैसा ही रोग लगा है कि हमारे कार्यो पर लोग क्या कहेंगे ?यानि आप कुछ भी करो उन्हें इस बात की फुर्सत ही नहीं की क्या कहे और क्या सोचे |क्योंकि जो स्वयं परामुखापेक्षी नहीं उन्हें तो आपके कार्यो पर नजर रखने की आदत ही नहीं और जिन्हें आदत है वे तो स्वयं ही डूबने वाली नाव पर सवार है इसलिए उनकी टिप्पणी कोई मायने ही नहीं रखती है |
अब बात उठती है कि तो आखिर हम करे क्या ????? 

यह सवाल अक्सर लोगो को सालता रहता है कि जी हम करे क्या ???

यह सवाल ही इस बात का धोतक है कि वास्तव में हम कुछ करना ही नहीं चाहते बल्कि कर्म करने से बचने के लिए किसी तर्क की ढाल की खोज करना चाहते है |यह अटल सत्य है कि हमारे जन्म और मृत्यु पर निसंदेह हमारा बस नहीं है |यह निश्चित रूपसे सृष्टि की किसी वैज्ञानिक और अध्यात्मिक प्रक्रिया का परिणाम मात्र है |जब हमारे जन्म पर हमारा अधिकार नहीं तो फिर हमारे स्व-धर्म पर भी हमारा अधिकार नहीं होसकता है |यह भी निश्चित रूप से पहले से ही निर्धारित होचुका होगा | जब हमारा स्व-धर्म पहले से ही निर्धारित है तो उसे चुनने का तो हमे अधिकार नहीं है| क्योंकि हम या तो नास्तिक हो सकते है या फिर आस्तिक ,दोनों एक साथ तो नहीं होसकते न ??? यदि हम आस्तिक है और यह मानते है कि ईश्वर या प्रकृति का कोई नियंत्रक है तो निश्चित रूपसे किसी प्राक्रतिक और अध्यात्मिक कारण से ही हमारा जन्म हमारे माता-पिता के घर हुआ है |जिस प्रकार हमें अपनी जननी और जनक को स्व-माता और स्व-पिता मानने में हर्ष और अनुकूलता महशूश होती है |वैसे ही स्वधर्म में अपने को समर्पित करने में अनुकूलता प्राप्त होती है | 

इसके लिए गीता के इन श्लोको का उदहारण यहाँ उचित होगा |

"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह : !! 35!! तीसरा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है | अपने धर्म का पालन करते हुए तो मरना भी कल्याणकारक है ,जबकि दूसरे का धर्म तो भय को देने वाला होता है |

"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम !!४७!!अठारहवा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है | स्वभाव से नियत किये हुए कर्म अर्थात वर्नाधार्मानुसार नियत कर्म कर्ता हुआ ,मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता है |

"सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत !
सर्वारम्भा हि दोषेण धुमेनाग्निरिवावृता !!४८!!अठारहवा अध्याय

हे अर्जुन दोषयुक्त भी जन्म के साथ उत्पन स्वधर्म को नहीं त्यागना चाहिए ! निश्चित ही धुवाँ से अग्नि की भांति सभी कर्मो का आरंभ तो दोष से ढका हुआ है !

अब हम जिस वर्ण में पैदा हुए है उसके अनुसार हमारा जो भी कर्म है ,वास्तव में यही हमारा स्वधर्म है और इसका ज्ञान हमारे लिए अति आवश्यक है | हम स्वधर्म के बिना जी भी सकते है, किन्तु वह जीवन सफल नहीं कहा जासकता ठीक वैसे ही जिस प्रकार अपनी जननी के बगेर बालक का पालन पोषण हो तो जाता है ,किन्तु स्वमाता तो आखिर स्व-माता ही होती है |विमाता भले ही कितना ही ऊँचे दर्जे का स्नेह और ममता से पालन करले किन्तु शिशु में जो पालन अपनी जननी के द्वारा होता है उसकी तुलना तो नहीं ही की जासकती न !

इसलिए हम सभी का यह परम कर्तव्य है की हम सर्वप्रथम अपने धर्म को पहिचाने जो निश्चित है और उसका ज्ञान प्राप्त करे ताकि हमारा जीवन सार्थक होसके |

"जय क्षात्र-धर्म "


Friday, 26 April 2013

क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षत्रिय राजपूत का स्वधर्मः-

यानी क्षत्रिय जाति नहीं धर्म है और पूजा नहीं कर्म है.
भारत की सभ्यता अति प्राचीन मानी जाती है। यह युगों-युगों से अनेक उत्थान-पतन की परिस्थितियों से गुजर चुकी है। हमनें उनसे प्रेरणाऐं भी लीं और सबक भी सीखे। यह मानवतावादी, विश्ववादी, न्याय प्रेम करुणा का देश धर्म एवं जाति प्रधान है। यह देश बाहरी दुनिया के अनेक कौमों का राजनैतिक, आर्थिक गुलाम तो रहा लेकिन इसकी मूल आत्मा जो संस्कृति एवं आध्यात्म में थी इसलिए इसका अस्तित्व आज भी जिन्दा है लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद यह देश जिन यूरोपीय, अमेरिकी देशों की नीतियां अपनाकर अपने ही हाथ अपना आत्मघात कर रहा है, वे अब सहन नहीं की जा सकती है । यदापि यूरोपीय नीतियों के सदियों पुराने प्रभाव से एक बहुत बड़ा वर्ग उसका प्रवक्ता बन गया है। ऐसे लोग केवल आर्थिक लाभ के लिए स्वयं ही गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज भी एक उपेक्षित क्षत्रिय बुद्धिजीवी वर्ग इन यूरोपीय नीतियों का घोर विरोधी है जो शक्ति हीनता के कारण लड़ने में सक्षम नहीं है। उसे नई शक्ति देने के लिए भारत की एक विशिष्ट राजनैतिक जाति क्षत्रिय राजपूत राष्ट्र और विश्व को धर्म, संस्कृति और राजनीति को नई दिशा देने के लिए जन्म ले रही है। अधोगति प्राप्त राजनैतिक चेतना से शून्य समाज में उपेक्षित तथा आजादी के बाद हर तरफ से पीडि़त इस महान जाति को एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए जागृत करने और अपनी परंपरा के अनुसार देश धर्म के लिए बलिदान देने के लिए तैयार करने का यह छोटा सा प्रयास है। जिस प्रकार कभी विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध आज के पंजाब प्रदेश की महान बलिदानी जातियों जाटों, सिक्खों, राजपूतों को गुरुओं ने अपना बलिदान देकर बलिदान देने के लिए तैयार किया था। जब-जब इस देश में जाति और धर्म के नाम पर अन्याय, अत्याचार हुए तब-तब इसी जाति में युग पुरुष पैदा हुए जैसे-भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह आदि जिन्होंने मानव जाति को अन्याय अत्याचार से मुक्त कराया। हमें पुनः एक बार इस विकृत जाति एवं पंथवाद से मुक्त वेदान्त पर आधारित विश्व की पुर्नरचना के लिए इन जातियों और पंथों को मानवता की ओर मोड़ना होगा और अपने राष्ट्र तथा विश्व के अनेक धर्मों के साथ समन्वय स्थापित करना होगा।
वर्ण विज्ञान के अनुसार क्षत्रिय शक्ति का प्रतीक है। शक्ति के बिना ज्ञान नपुंसक है। दुर्भाग्य से भारत एक हजार वर्ष से शक्तिहीन हो गया है। इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है, हम स्वयं ही हैं। इसलिए पुनः शक्तिवान बनने के लिए किसी दूसरे की ओर नहीं देखना है। सिर्फ अपने क्षत्रिय धर्म का आचरण करना है। जब आप क्षत्रिय धर्म का पालन करेंगे तो सम्पूर्ण समाज आपको नेतृत्व भी सौपेंगा। धर्म और वर्ण धर्म के उदय का पूर्ण अवसर आ गया है। जो इसको पहचानेंगे और छात्र धर्म का आचरण करेंगे वे समाज में अपना स्थान बनायेंगे। जो युग धर्म नहीं पहचानेंगे, वे पिछड़ जायेंगे और स्वयं दलित हो जायेंगे। क्षत्रिय केवल सामान्य मानव नहीं बल्कि विशिष्ट मानव के रूप में पहचाने जाते हैं इसलिए हमें अपने राष्ट्रीय मानव कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। हमें अपनी शक्ति को राष्ट्रहित में लगाने की तैयारी करनी है। अपनी युवा शक्ति को ज्ञान एवं शक्ति से सम्पन्न बनाकर प्रशिक्षित करना है ताकि ये अपने स्वधर्म का पहचाने।
भोग परायण संस्कृति के विरुद्ध आम आदमी जो शोषण और दमन का शिकार हो रहा है के लिए क्षत्रियों को आगे आना होगा इससे पूरा विश्व छात्र धर्म को समझेगा और मानवता को शोषण से मुक्ति मिलेगी। आज क्षत्रिय राजनैतिक आर्थिक अधिकारों से भी वंचित है और संख्या की राजनीति में शक्तिहीन हो गये हैं। इसके अलावा क्षत्रियों के अस्तित्व पर राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक हमले हो रहे हैं। इससे क्षत्रिय शक्तिहीन एवं प्रतण्डित हो रहा है। राष्ट्र को रक्षा करने वाले ही यदि स्वयं शक्तिहीन हो जायेंगे तो समाज की रक्षा कौन करेगा। इसलिए जागो, उठो और अपनी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान की तैयारी करो। किसी कौम के सामने जब ऐसे संकट खड़े होते हैं तब या तो वो हमेशा के लिए दासत्व स्वीकार कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेती है अथवा इन चुनौतियों का जबाव देने के लिए फिर उठ खड़ी होती है। आज क्षत्रियों को पुनः उठ खड़ा होना है या अपने कुल, गौरव, मान मर्यादाओं एवं संस्कृति को छोड़कर नष्ट हो जाना है।
हम अपना एक नया इतिहास बना सकते हैं हमें सदैव आशावादी होना चाहिए। निराशा का नाम ही मृत्यु है यह किसी भी व्यक्ति अथवा समाज पर लागू होती है। हमें अन्तर्राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा द्वारा चलाये जा रहे मिशन राजपूत इन एक्शन के इस संघर्ष में अपने सजातीय बुद्धिजीवियों को मार्गदर्शन तथा व्यापारियों का आर्थिक सहयोग लेना है यही युगधर्म है।
वर्तमान युग परिवर्तन की घड़ी में क्षत्रियों को अपना राष्ट्रीय और मानीवय कर्तव्य समझना होगा। इतिहास और महापुरुषों से प्रेरणा लेनी होगी। हमारे यहां आदिकाल से लोक कल्याणकारी राजतन्त्र रहा है। उसकी अपनी मर्यादाऐं थीं। जिसे सामन्ती युग कहते हैं उस सामन्त शब्द का जन्म विदेशी बर्बर कौमों के गुलामी के काल में हुआ। सामन्त शब्द पश्चिम की देन है जब तक समाज रहेगा समाज की व्यवस्था के लिए एक संचालन सूत्र रहेगा। भारत के अतीत का समाज विज्ञान पूर्ण और धर्म आधारित है। इसीलिए हमें अपने अतीत मानव कल्याणकारी क्षत्रिय वर्ण धर्म के पुर्नउत्थान साहसपूर्वक अपने विचारों को जगत में रखना चाहिए। आधुनिक भारत में क्षत्रियों को छात्र धर्म अपनाना होगा यदि क्षत्रियों ने अपना स्वधर्म अपना लिया तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो राज्य व्यवस्था का संचालन सूत्र उनके हाथ से छीन सके। इतिहास में भगवानों के रूप में जिनकी पूजा हुई और हो रही है वे सब क्षत्रिय पुत्र ही हैं। बोद्ध और जैनों ने तो भावी युगों के लिए यह कहा है कि आगे आने वाले युगों में क्षत्रियों में ही भगवान बुद्ध और महावीर आयेंगे। आधुनिक युग के संदर्भ में पृथ्वीराज चैहान, राणा प्रताप, शिवाजी, दुर्गादास राठौर, गुरु गोविन्द सिंह जैसे क्षत्रिय आयेंगे। इतनी महान ऐतिहासिक पूंजी के वारिस अपने क्षत्रिय धर्म को पहचानें । भारत और विश्व जननी भारत माता की निगाहें इसी क्षत्रिय पुत्र के अवतरण की प्रतीक्षा कर रही हैं।
विराट क्षत्रिय समाजः-
वे सब सैनिक जातियां जो अपने आर्थिक पिछड़ेपन के कारण पिछड़े वर्ग में आती हैं वे सब जातियां जिनका चरित्र लड़ाकू है और जिनके राज्य भी रहे हैं विराट क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग है लेकिन ऐतिहासिक तथा आर्थिक कारणों से हम टूट गये हैं। हमको पुनः एकीकरण के लिए काम करना होगा स्मरण रहे कि इतिहास ने हमारे अनेक भाईयों को हमसे अलग किया है। हमें हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने गले लगाना होगा तभी हमारी शक्ति बनेगी यदि वे सभी क्षत्रिय जातियां संगठित हो जायें तो क्षत्रिय संख्या की दृष्टि से भी शक्तिशाली हो जायेंगे। यदि क्षत्रिय शक्ति संघर्ष करे तो ये वर्ण अपने खोये हुए स्थान को पुनः प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि अभी तक यह वर्ग पश्चिम के वैचारिक हथियारों से लड़ते रहे हैं। इसलिए विफल भी रहे हैं। अब ये शक्तियां जागृत हो रही हैं और वह अपने भारतीय विचारों के हथियारों से लड़ने को तैयार है। आयुवान सिंह स्मृति संस्थान द्वारा चलाई जा रही विचार क्रांति इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानव कल्याण के लिए हितकर सिद्ध होगी ।


Tuesday, 2 April 2013

"दहेज प्रथा" (क्षत्रिय परम्परा या एक कुप्रथा)

 "दहेज प्रथा" (क्षत्रिय परम्परा या एक कुप्रथा)

आज के समाज में कन्या का पैदा होना एक अभिशाप हो गया है, लोग दहेज की इस प्रकार मांग करते हैं की कोई भी ईमानदार व्यक्ति ईमानदारी से उपार्जित धन के द्वारा उस मांग की पूर्ती नहीं कर सकता है ।इससे स्पष्ट है की दहेज की मांग करने वाले समाज के ईमानदार लोगो को भ्रष्ट होने को बाध्य करते हैं ,क्या ऐसे समाज को आप समाज कहना पसन्द करेगे ? आज जब किसी घर में कन्या का विवाह होता है तो सबसे पहले दहेज की पुर्ति के लिये उसके पिता ,माँ, भाई की जमीन बिकती है ! प्रश्न यह उठता है की आखिर जब जमीन नहीं रहेगी तब क्या बिकेगा ? दुसरा प्रश्न पैदा होता है कि जो बहिन अपने भाई की रोजी रोटी का साधन , उसकी जमीन को बिकवाने का हेतु बनती है उस भाई - बहन के बीच क्या सोहार्द रह पायेगा ? तीसरा प्रश्न है कि वर पक्ष के लोग जो कन्या पक्ष की रोटी रोजी का साधन बिकवाने के हेतु बनते हैं क्या वे सम्बन्धी कहलाने के लायक है व क्या उनके कन्या पक्ष के साथ जीवन में कभी भी मधुर सबंन्ध रह पायेंगे? यदि उपर्युक्त तीनो प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं , तो स्पष्ट है की यह दहेज प्रथा केवल परिवारो की आर्थिक स्थिती को ही नष्ट करने वाली है बल्की यह प्रथा समाज में आपसी वैमनस्य व असामाजिकता का विकास करने में सर्वाधिक सहयोगी है ! अधिक दहेज, अधिक सम्मान यह कल्पना यदि एक व्यक्ति में हो तो उसका ईलाज आसानी से सभंव है , लेकिन समाज का अधिकांश वर्ग ईसी दृष्टि से सोचने लगे तो फिर ईस कुरीती से सघंर्ष करने में बहुत कठिनाईया उत्पन्न हो जाती है ! लोग अपने स्वार्थ के लिये आज दुसरे के हित व अपने भविष्य का बलिदान कर रहें हैं व इस प्रकार स्वयं ही अपने लिये कब्र खोदने में व्यस्त है ! यह सारा कुकर्म परम्पराओ व रिति रिवाजो के नाम पर हो रहा है ! आज वर पक्ष व उसके साथ आने वाला बाराती कन्या पक्ष के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे शोषण करने का अधिकार भगवान द्वारा उन्हे प्रदत किया गया हो ! जबकी हमारे समाज की परम्परा ईसके बिल्कुल विपरीत है ! राजा दशरथ राजा जनक से कहते हैं कि " आप महान हैं , आपकी और मेरी तुलना सभंव नहीं है , आपने कन्या का दान किया है व मैंने दान ग्रहण किया है ! दाता से दान ग्रहण करने वाला कभी बङा नहीं हो सकता है !"
कहने को तो हम भी आज कन्यादान ही करते हैं, लेकिन हम दान नहीं लेते, हम तो धौस व् डर दिखाकर किसी का शोषण कर रहे हैं, जिसको डकैती कहा जा सकता है, ऐसे लोग दान ग्रहण कर्ता नहीं हैं ! क्या यह दशरथ व् जनक द्वारा स्थापित परम्परा है ? और यदि नहीं है तो यह डकैतों की परम्परा क्षत्रिय परम्परा नहीं है ! यदि हमें क्षत्रिय के रूप में जिन्दा रहना है तो इस परम्परा का त्याग करना ही होगा !
पहले लोग दान में भी कुछ न कुछ मर्यादा का निर्वाह करते ही थे ! किस वस्तु का दान लिया जा सकता है या लेना चाहिए यह एक विचारणीय प्रश्न है ! हम तो आज लोहे का भी दान ले रहे हैं, जिसको ब्राह्मण भी धारण नहीं करता! यदि इसी प्रकार से अमर्यादित जीवन पद्दतियां चलती रहीं तो विनाश के सिवाए कोई विकल्प नजर नहीं आता है! इस कुरीति के भी प्रचलन में महिलाओं का सर्वाधिक योगदान है, दूसरों से स्पर्धा कर वे अपने पुत्र के लिए अधिकाधिक दहेज़ की मांग करती हैं व अन्ततोगत्वा यह दहेज़ पुत्र-वधु के दुर्व्यवहार के रूप में प्रकट होकर उनके लिए ही कष्ट का सबसे बड़ा साधन बनता है !
अतः यदि हम चाहते हैं की भाई -बहिन के बीच स्नेह रहे, यदि हम चाहते हैं की हमारी संतानें सुखी पारिवारिक जीवन व्यतीत करें, यदि हम चाहते हैं की पुत्र वधुएँ परिवारजनों का आदर करें, उनकी सेवा करें, तो हमें इस विनाशकारी बुराई से मुक्त होना ही पड़ेगा ! दहेज़ मांगने की परम्परा का परित्याग करना पड़ेगा ! तभी समाज में वास्तविक सामाजिकता का विकाश होगा ! समाज, व्यक्ति तब शोषक नहीं कहलायेगा, लोगों में समाज के प्रति स्नेह उत्पन्न होगा व सामाजिक गतिविधियों में लोगों की रूचि पैदा होगी ..!!

लेखक :- आदरणीय श्री देवीसिंह जी महार
पुस्तक :- क्षत्राणी ,संस्करण -4 (कुवंर आयुवान सिंह जी हुडील स्मृती संस्थान , जयपुर)


Sunday, 31 March 2013

यदि महिलाये क्षात्र परम्परा का पालन करेंगी तो वह कभी भी अपने आपको विधवा होने से बचाए रखेगी. जिसमे महीलाओ व् बालिकाओ द्वारा एक महान कार्य जो वे सब पहले करती थी और आज नहीं करती है | वो है मन्त्र जाप मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मंत्र में मन का अर्थ है मनन करना अथवा ध्यानस्त होना तथा त्र का अर्थ है रक्षा। इस प्रकार मंत्र का अर्थ है ऐसा मनन करना जो मनन करने वाले की रक्षा कर सके। अर्थात मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है।  और वो मन्त्र  है महामृत्युन्जय मन्त्र का जप और वह कुछ इस तरह से है


 ॐ त्रयम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम |
 उर्व्वारुकमिव बन्धनात म्रत्योर्मुक्षीय माम्रतात ||
ॐ त्रयम्बकम यजामहे सुगंधिम पति वेदनम |
 उर्व्वारुकमिव बन्धनात दितो मुक्षीय माम्रतात || (यजु - ३/60)

उपयुक्त मन्त्र से भी यह स्पस्ट है तथा परम्परा भी यही रही है की क्षत्रानिया हमेशा सदाशिव की ही उपासक रही है सदाशिव सारे संसार के गुरु है और क्षत्रानिया गुरु रूप में अपने पति को प्राप्त करने के लिए सदा से भगवान सदाशिव की उपासना करती है |

उपर्युक्त मंत्र कितना प्रभाव शाली है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की इस मंत्र के दो खंडो में से जो पहला खंड है वही महामृतुन्जय मंत्र कहलाता है| जब किसी व्यक्ति के भयानक मृत्यु का योग हो उस समय उसकी प्राण रक्षा के लिए इसके जप किये जाते है | अब आप कल्पना कीजिये की जिस परिवार की प्रत्येक स्त्री, पुत्री , माता व् बहिन आदि प्रतिदिन इस मंत्र का जप करे और जीवन पर्यन्त करे , उनके परिवार जनो से क्या कोई कर्मक्षेत्र व युद्ध क्षेत्र में लोहा लेने का साहस कर सकता है|
यही कहना है की क्षत्रियो के शोये व पराक्रम के महान इतिहास के पिछे उनकी धर्म प्राण तपस्वी पुत्रियों, पत्नियों व् माताओ का ही महान योगदान रहा है|


Friday, 29 March 2013

"धर्मं शास्त्र और क्षत्रिय "

"धर्मं शास्त्र और क्षत्रिय "

गीता का यह निष्काम कर्म योग ही तो क्षात्र-धर्म (स्वधर्म) का आधार है ...


आज उपलब्ध लगभग सभी धर्म शास्त्रों में किसी न किसी रूप में क्षत्रियों का वर्णन अवश्य ही आता है | फिर भी धर्म शास्त्रों का शोध पूर्ण अध्ययन किया जाये तो एक बात उभर कर सामने आती है कि अधिकांश धर्म शास्त्र विरोधाभाषी है  | जैसे आज भारतीय जन मानस पर गहरी छाप छोड़ चुकी "श्री राम चरित मानस " को ही लें | इसमें गोस्वामीजी लिखते है कि महाराज मनु और महारानी शतरूपा को वैराग्य हुआ तो वे नैमीसारान्य में जाकर घोर तप करने लगे और उनकी इस कठोर तपस्या के मध्य साधारण देवी देवताओं से लेकर ब्रह्मा,विष्णु और आदिदेव शंकर जी कई बार आए और उनकी कठोर तपस्या का प्रयोजन जानना चाहा किन्तु मनु जी ने इनको न तो तरजीह ही दी और न ही इस ओर ध्यान ही दिया | उनका लवना तो परम-पिता परमेश्वर, इस जगत के आधार, अखिल ब्रह्मांड के नायक, अक्षर, अकाल, परब्रह्म के प्रति लगी हुयी थी और अंत में वह परब्रह्म प्रकट भी हुए, और उस परब्रह्म का जो वर्णन गोस्वामीजी ने किया है वह श्री राम और साक्षात् प्रकृति स्वरूपा माता सीता का है न कि विष्णुजी और एवं लक्ष्मी जी | फिर उन्ही को अपने पुत्र रुप में जन्म का वरदान पाने में राजा मनु एवं शतरूपा सफल भी हुए | किन्तु आगे चलकर इन्ही गोस्वामीजी की रामचरित मानस में श्री राम को विष्णुजी और माता सीता को लक्ष्मीजी का अवतार बता दिया जाता है और इसी में सुन्दर कांड में श्री हनुमानजी जब लंका की राजसभा में रावण के समक्ष उपस्थित होते है तो रावण को समझाते है  "शंकर सहस्त्र ,विष्णु ,अज तोही ! सकहिं राखि राम कर द्रोही !!" अर्थात हजार शंकरजी, हजार ब्रह्माजी और हजार विष्णु जी मिलकर भी उसे नहीं बचा सकते जो श्री राम का द्रोही है अर्थात श्री राम विष्णु जी कई हजार गुना बड़े और शक्तिवान है | फिर बीच बीच में गोस्वामीजी श्री राम को विष्णुजी का अवतार श्री को कभी आकाश और कभी एकदम से धरती पर पटक कर आखिर गोस्वामीजी सिद्ध क्या करना चाहते है मेरी तो समझ से परे है | जब मनुजी को अक्षर, परब्रह्म ने प्रकट होकर दर्शन दिए थे तब वे श्री राम और सीता जी के रूप का वर्णन स्वयं गोस्वामीजी ने दो भुजा धारी, धनुष बाण धारी के रूप में किया है और अगले जन्म में महारानी कौशल्या के सामने उनको गोस्वामीजी द्वारा "भये प्रगट कृपाला ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,," में उनको चार भुजा धारी , विष्णुजी बना देते है | आखिर गोस्वामीजी साबित क्या करना चाहते है ???

क्या श्री राम महाराज दशरथ के अंश और महारानी कौशल्या की कोख से पैदा नहीं हुए थे ??  तो क्या उस अक्षर , उस सर्व शक्तिमान परम-अविनाशी इश्वर द्वारा महाराज मनु और शतरूपा को दिया गया वचन झूंठा था ??? क्या इश्वर के लिए कुछ भी असंभव हो सकता है जो वह कोख में भी प्रविष्ट नहीं हो पाया ???????
 मुझे बड़ा आश्चर्य है कि सैकड़ों बार अध्यन कर चुके प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान कभी इस ओर गया ही नहीं | बात इतनी ही नहीं है आगे देखिये धनुष यज्ञ के समय परशुरामजी से श्री राम के मुख से गोस्वामीजी ने कहलवाया है कि "आप लड़ेंगे  तो मेरी हानि ही है क्योंकि मारूगा तो ब्राह्मण की हत्या का पाप लगेगा और हांरूँगा तो सुर्यवंश की अपकीर्ति होगी |" यह क्या कहलवा रहे है तुलसीदास जी ???? और वो भी उन श्री राम जी के मुख से जिन्होंने अपने जीवनकाल में सिर्फ "वानर राज बाली" के अतिरक्त जिसे भी मारा वह ब्राह्मण ही था | ऐसा भी नहीं की धनुष यज्ञ से पूर्व उन्होंने किसी ब्राह्मण को नहीं मारा हो , इस यज्ञ तक पहुँचने से पूर्व ताड़का, सुबाहु आदि को मारा जा चुका था | इसके अलावा रावण ,कुम्भकरण ,मरीचि ,सुबाहु, सूर्पनखा सहित समस्त दैत्य ब्राहमण ही तो थे | दैत्य का अर्थ होता है दिति के पुत्र ,ब्रह्माण ऋषि कश्यप और ब्राह्मण कन्या दिति के वंशज ही दैत्य कहलाये थे | यहाँ तक की महर्षि बाल्मीकि जी ने जिस रामायण की रचना की उसका तो नाम भी "पौलस्त्य वध " जिसका का सीधा सा अर्थ पुलस्त्य ऋषि के वंशजों का वध | इस राम चरित मानस में उसी के नायक श्री राम के चरित्र में इस प्रकार की विरोधाभाषी बाते किसी ने नोट नहीं की यह बड़े ही आश्चर्य की बात है | केवल राम चरित मानस में ही ऐसा हो ऐसा भी नहीं है | महाभारत में वेद-व्यास जी के नाम से विख्यात श्री कृष्ण दैवपायन (अर्थात दुसरे कृष्ण) को पराशर ऋषि एवं सत्यवती का नाजायज पुत्र बताया गया है | जबकि उन्ही वेद-व्यास जी से उनके शिष्य पूंछते है कि"आपको श्री हरि का पुत्र क्यों कहते है ??" तब वेद-व्यास जी बताते है क्योंकि "मुझे श्री हरि ने अपनी वाणी से उत्पन्न किया है | मै किसी भी माता या पिता के द्वारा पैदा किया गया नहीं हूँ |"फिर महभारत जिसके रचियता स्वयं वेद-व्यास जी ही है उसमे वे अपने आपको पराशर ऋषि एवं सत्यवती की नाजायज संतान क्यों मानेंगे ???? आगे देखिये फिर महाराज विचित्र-वीर्य जब निसंतान रहकर मर जाते है तो उनकी रानियों का इन्ही वेद-व्यासजी से नियोग करवा कर पुत्र उत्पन्न करवाए जाते है | यह सब कितना अनैतिकता से भर पूर लगता है | जब आज के परिवेश में यह अनैतिक लग रहा है तब उस समय तो घोर अनैतिक लग रहा होगा | पर ऐसा धर्म शास्त्रों में क्यों है ?? जबकि विचित्र-वीर्य का नाम ही विचित्र-वीर्य इसलिए पड़ा था क्योंकि उनके मृत्यु के उपरांत भी उनका अंश सुरक्षित रखा जा सकता था जिसे वेद-व्यास जी जैसे उच्च कोटि के ऋषि ही सुरक्षित रखने की विधि जानते थे | जिसे पितामह भीष्म के साथ वेद-व्यासजी की अभिन्न मित्रता के कारन वेद-व्यासजी ने उस विधा का उपयोग कर महाराज विचित्र वीर्य के अंश से ही रानियों के पुत्र पैदा करवाए | मुझे तो लगता है की धर्म शास्त्रों के साथ कोई छेड़छाड़ हुयी है और उसमे क्षत्रिय पात्रों के चरित्र को निम्न साबित करना उदेदश्य रहा होगा | उनके धार्मिक ग्रंथों में इस प्रकार का झूंठ भर दिया गया है जिसमे लगता है की सत्य इस असत्य के ढेर में कहीं दब कर रह गया है |इन्होने श्री कृष्ण के चरित्र को तो ऐसा पेश किया है जो कि लगता कि कृष्ण इश्वर नहीं कोई आवारा छोकरा था |योगेस्वर श्री कृष्ण के कभी 16108 गोपिकाओं से शारीरिक सम्बन्ध बताते है तो कभी महाराज  के जरिये अनैतिक लीलाए बताते है | जबकि श्री कृष्ण जब गोकुल से मथुरा जाते है तब उनकी उम्र मात्र ११-१२ वर्ष थी |इतनी अल्प-आयु के बालक से ऐसी अनैतिक लीलाएं इन धर्म के ठेकेदारों ने कैसे संभव करा दी यह बात अपने आप में ही शोध का विषय है | क्योंकि मथुरा आने के बाद तो श्री कृष्ण फिर गोकुल लौट कर गए ही नहीं | अब जब लगभग सभी धर्म शास्त्रों में इस तरह कि घोर मिलावट है तब एक साधारण क्षत्रिय अपने धर्म कर्म को कहाँ से ग्रहण करे ? और इन धर्म शास्त्रों को पूरी तरह से नकार दें तब भी हानि- ही हानि है क्योंकि लाखों करोड़ों वर्षो का क्षत्रिय इतिहास ही तो है यह धर्म शास्त्र | फिर करें तो क्या करें ??? इसका एक ही उत्तर है दूध में भारी मात्रा में मिले पानी में या तो हंस बन कर पानी छोड़ कर सिर्फ दुग्ध पान किया जाये या फिर दूध को गर्म करके जमाना पड़ेगा और फिर असली दूध दही बनकर पानी स्वयं अलग हो जायेगा अर्थात धर्म शास्त्रों का अध्यन या तो शोध पूर्ण तरीके से किया जाये ,जिससे हंस कि तरह केवल दूध का ही पान किया जाये  या फिर ईश्वर के नाम स्मरण से अपने विवेक को और अपने ज्ञान को जागृत करें जिससे सत्य दही कि तरह आपके सम्मुख होगा | यदि बिना इसके हम उपलब्ध धर्म शास्त्रों का आंख मींच कर विश्वास करने लगे तो ठगे जायेंगे और अधिकांश धर्म शास्त्र जो कि हमारा इतिहास मात्र है को इतिहास के तौर पर ही लेना होगा | हमे जानना होगा कि किस रास्ते  पर चलकर हमारे पूर्वजों ने अपने धर्म (स्वधर्म) का पालन किया है| पवित्र ग्रन्थ श्री गीता में चौथे अध्याय के पहले ही श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है
"इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाक्वे अब्रवीत !!१!!"
अर्थात मैंने सृष्टि के आरंभ में इस निर्विकार योग को विवस्वान आदित्य के लिए कहा था और विवस्वान आदित्य ने मनु को , मनु ने इक्ष्वाकु को कहा था |
"एवं परंपराप्राप्तिमिम' राजर्षयो विदः !
स कालनेह महता योगोनष्ट : परंतप !!२!!
अर्थात इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को क्षत्रिय ऋषियों ने जाना ,वह योग बहुत काल से इस लोक में नष्ट हो गया है अर्थात आज से पहले भी यह गीता का ज्ञान या योग जो परंपरा से प्राप्त क्षत्रिय ऋषियों के पास पहले से ही था किन्तु नष्ट हो गया था | उसी ज्ञान योग को श्री कृष्ण ने अर्जुन को पुनः बताया और या गीता का ज्ञान अर्जुन को तब दिया गया जब अर्जुन क्षात्र-धर्म को बीच रण- क्षेत्र में अकेला छोड़कर ब्राह्मण-धर्म की ओर पलायन करने के लिए आतुर था | इस ज्ञान योग को ग्रहण कर अर्जुन पुनः क्षात्र-धर्म के पालन के लिए उठ खड़ा हुआ और सर्व श्रेष्ठ क्षत्रियों की गिनती में आ गया | इसका अर्थ यह हुआ कि गीता का यह निष्काम कर्म योग ही तो क्षात्र-धर्म (स्वधर्म) का आधार है | क्योंकि अर्जुन इस क्षात्र-धर्म से पलायन को आतुर था | अतः वह कर्म योग जो श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया वह हम क्षत्रियों के पास परम्परा से प्राप्त था | अतः आज जब सभी अर्जुन की तरह क्षात्र-धर्म से पलायन आतुर है तो इस क्षात्र-धर्म के पुनः पालन के लिए हम सभी श्री गीता जी के योग , ज्ञान और निष्काम कर्म योग की तुरंत और अवश्यंभावी आवश्यकता है | तो हम सभी को अपने आपको अर्जुन के स्थान पर रख कर इस गीता का शोध पूर्ण अध्यन की आवश्यकता है | अक्षरश: इसलिए नहीं की मुझे लगता है की इनकी मिलावट से श्री गीता जी अछूती रह गयी हों संभव नहीं लगता | फिर भी श्री गीता जी में इनकी मिलावट उतनी नहीं हो पायी है  जिंतना कि रामायण एवं महाभारत में है | अतः हम सभी अपने धर्म क्षात्र-धर्म के पालन के आधार को श्री कृष्ण द्वारा दिए गए इस योग को समझे एवं अपने जीवन में उतार कर उसे व्यवहारिक सिद्ध करें | धर्म शास्त्रों का क्षात्र-धर्म पुनरुत्थान में सिर्फ यही योगदान हो सकता है |


"जय क्षात्र-धर्म" 

Saturday, 23 March 2013

क्षत्रिय व क्षात्र धर्म

क्षत्रिय व क्षात्र धर्म           

 'क्षत्रिय'
 'क्षत्रिय' शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ है जो दूसरों को क्षत (विनाश) से बचाये।
"क्षति से समाज की रक्षा करता है वो है क्षत्रिय" यथार्थ में सृष्टि को क्षय (विनाश) से त्राण कराने वाला 'क्षत्रिय'  कहलाता है|
शास्त्र द्वारा परिभाषित व् इतिहास द्वारा समर्थित रक्षण से तात्पर्य है विष समाज से अमृत समाज की रक्षा करना |
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में उपदेश देते हुए कहा था “ में  साधुओ, अर्थात सज्जन पुरुषो यानि अमृत समाज की रक्षा करने व् दुष्ट लोगो अर्थात विष समाज का विनाश करने के लिए अवतार लेता हूँ “
इसी प्रकार के क्षत्रियोचित कार्यो के लिए “भगवान नारायण ने अपने ह्रदय से क्षत्रिय को पैदा किया |