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जप महिमा
जप क्या नहीं कर सकता ? जप दुःखियों का दुःख मिटा सकता है, रोगियों के रोग
मिटा सकता है, अभक्त को भक्त बना सकता है, मुर्दे में प्राणों का संचार कर
सकता है।
जप एक ऐसी निरंतर चलने वाली साधना या परम्परा
थी जिसका पालन हमारे पूर्वज करते आ रहे थे लेकिन आज के आधुनिक और साक्षर
युग में हमने इस कालजयी परम्परा को लुप्त कर या भुला दिया है, जिससे
क्षात्र तत्व का ह्वास व नये नये दुर्गुणों व बुराइयों से घिर गए है, इसी
की वजह से क्षत्रिय सत्त्ताच्युत होकर शुद्र्तत्व की भांति आम आदमी का जीवन
यापन कर रहे है।
पूर्वकाल में अपने पिता द्वारा अपने पुत्र व
पति के द्वारा अपनी पत्नी को मंत्र या नाम जप की दीक्षा दी जाती थी जिसका
वे ताउम्र पालन करते थे।
कलियुग में भी जप सर्वोपरि है। भगवान
श्री राम ने अहिल्या का उद्धार किया। लेकिन राम जी के नाम जप ने तो करोड़ों
लोगों का उद्धार करने का काम का किया है।
भ्रमर (भँवरा ) एक चेतना युक्त कीड़े को लगातार भ्रमर (जप) द्वारा प्राण डालकर अपने जेसा ही कीट बना देता है।
नारदजी पिछले जन्म में विद्याहीन, जातिहीन, बलहीन दासीपुत्र थे। साधुसंग
और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से वे आगे चलकर देवर्षि नारद बन गये। साधुसंग और
भगवन्नाम-जप के प्रभाव से ही कीड़े में से मैत्रेय ऋषि बन गये।
हम
देखेंगे की हमारे आस पास में भी अनेक जप के प्रभाव से ही क्षत्रियो मे सती व
झुंझार हुए है जिन्होंने अपना मस्तक कटवाने के बाद भी वीरता पूर्वक युद्ध
किया है।
जप करने से क्या होता है? या भगवन्नाम के जप से क्या फायदा होता है? कितना फायदा होता है ?
इसका पूरा बयान करने वाला कोई वक्ता पैदा ही नहीं हुआ और न होगा लेकिन फिर भी इसके कुछ निम्न फायदे आप जरुर ले और उठा सकते है.-
जप व मंत्र के विज्ञान को समझें। मंत्र का सृजन यह ध्यान में रखकर किया
जाता है कि जप मंत्र की ध्वनियों का उच्चारण किस स्तर का शक्ति कंपन
उत्पन्न करता है और उसका जपकर्ता पर, बाहरी वातावरण पर तथा अभीष्ट प्रयोजन
पर क्या प्रभाव पड़ता है ? वस्तुत: जप से:-
(1) शरीर में स्थित चक्रों, उपत्यकाओं एवं ग्रंथियों की सामर्थ्य बढ़ती है।
(2) व्यक्ति में भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता विकसित होती है।
(3) जप से क्षत्रिये का तीसरे गुण तेज में वृद्धि होती है व इसके द्वारा
शक्ति, शांति, लंबी आयु, यश व अलौकिक क्षमताएं प्राप्त होती है।
(4) लगातार जप करने से ध्वनि के प्रभावोत्पदक चेतन तत्व जहां भी टकराते हैं, वहां चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं।
(5) मंत्र जप की दोहरी प्रक्रिया होती है-एक भीतर और दूसरी बाहर। लगातार
जप एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है जिससे सूक्ष्म शरीर में उत्तेजना
उत्पन्न होते है। चेतना में परिवर्तन होता है।
(6) जप और ध्यान के मेल से मानसिक शक्तियां सिमटने लगती है। उनका बिखराव बंद हो जाता है।
(7) कभी-कभी मन, जप करते-करते अचेतन की किसी बात में रमने लगता है। भटक
जाता है। तब ऐसे विचार उठने लगते है जिन पर ग्लानि होने लगती है। ऐसी
अवस्था में भटकें नहीं निराश न हों, बल्कि मन की इस उछलकूद को नजर अंदाज
करें। अपने आत्मतत्व पर विचार करने लगे। मन शांत होता चला जाएगा।
(8) जप से आत्मतेज बढ़ता है। उसकी प्रचंडता के कषाय-कल्मषों का नाश होता है और इसकी ऊर्जा से दैवीय तत्वों का विकास होता है।
(9) विश्वामित्र जी ने गायत्री मंत्र को रचा, इस सूर्य मंत्र (गायत्री
छन्द) के जप से मस्तिष्क का ऐसा परिमार्जन हो जाता है कि कुछ समय पहले जो
बाते अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण लगती थी, वे पीछे अनावश्यक और अनुपयुक्त
लगने लगती है।
(10) जप के द्वारा ऐसे अज्ञात परिवर्तन होते हैं जिनके
कारण दुख और चिंताओं से ग्रस्त मनुष्य थोड़े ही समय में सुख-शांति का जीवन
बिताने की स्थिति में पहुंच जाता है।
(11) संकट के समय में विपदाओं को हल करने का रास्ता सूझने लगता है।
(12) साधक का आपा इतना ऊंचा उठ जाता है कि आत्म साधना अपने आप पूरी होने लगती है।
(13) हम उत्कृष्ट जीवन जीने और अपना आत्म परिष्कार करने के लिए जप करें।
(14) जप का तत्व दर्शन हमारे जीवन का अंग बन जाए, वह विचारो और कार्यों में झलकने लगे। यही जप की सार्थकता है।
(15) थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।
(16) नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को
सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।
(17) सबसे खास, लगातार या अनवरत जप से प्राण का मुह आत्मा की तरफ हो जाता है व इससे प्राण तत्व जागृत, वृद्धि व मजबूत होता है।
जप में हम कुछ भी जप सकते है चाहे वह भगवान का नाम हो, मंत्र हो , या कुछ
और बात यह है की हर समय उठते, बैठते, सोते, जागते अपने अंतर्मन में हर वक्त
जप करते रहना ही चाहिये।
काम करते रहो नाम जपते रहो
पाप की वासनाओं से बचते रहो
इसी प्रकार "ॐ" भी केवल एक पवित्र ध्वनि ही नहीं, अपितु अनंत शक्ति का
प्रतीक है। ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है । अ उ
म् । "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना , "उ" का तात्पर्य है उठना,
उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो
जाना । ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है ।
ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है । मात्र ॐ
का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि
निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप
किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई । इस प्रकार ॐ रूपी मंत्र का जो जाप
करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
नामधन का खजाना बढ़ाते रहो
हरे राम हरे कृष्ण गाते रहो
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥
हरी ॐ निरंजन राम ।
हरी ॐ नमो नारायण ॥





