Friday, 26 April 2013

क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षात्र शक्ति और क्षात्र धर्म


क्षत्रिय राजपूत का स्वधर्मः-

यानी क्षत्रिय जाति नहीं धर्म है और पूजा नहीं कर्म है.
भारत की सभ्यता अति प्राचीन मानी जाती है। यह युगों-युगों से अनेक उत्थान-पतन की परिस्थितियों से गुजर चुकी है। हमनें उनसे प्रेरणाऐं भी लीं और सबक भी सीखे। यह मानवतावादी, विश्ववादी, न्याय प्रेम करुणा का देश धर्म एवं जाति प्रधान है। यह देश बाहरी दुनिया के अनेक कौमों का राजनैतिक, आर्थिक गुलाम तो रहा लेकिन इसकी मूल आत्मा जो संस्कृति एवं आध्यात्म में थी इसलिए इसका अस्तित्व आज भी जिन्दा है लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद यह देश जिन यूरोपीय, अमेरिकी देशों की नीतियां अपनाकर अपने ही हाथ अपना आत्मघात कर रहा है, वे अब सहन नहीं की जा सकती है । यदापि यूरोपीय नीतियों के सदियों पुराने प्रभाव से एक बहुत बड़ा वर्ग उसका प्रवक्ता बन गया है। ऐसे लोग केवल आर्थिक लाभ के लिए स्वयं ही गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज भी एक उपेक्षित क्षत्रिय बुद्धिजीवी वर्ग इन यूरोपीय नीतियों का घोर विरोधी है जो शक्ति हीनता के कारण लड़ने में सक्षम नहीं है। उसे नई शक्ति देने के लिए भारत की एक विशिष्ट राजनैतिक जाति क्षत्रिय राजपूत राष्ट्र और विश्व को धर्म, संस्कृति और राजनीति को नई दिशा देने के लिए जन्म ले रही है। अधोगति प्राप्त राजनैतिक चेतना से शून्य समाज में उपेक्षित तथा आजादी के बाद हर तरफ से पीडि़त इस महान जाति को एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए जागृत करने और अपनी परंपरा के अनुसार देश धर्म के लिए बलिदान देने के लिए तैयार करने का यह छोटा सा प्रयास है। जिस प्रकार कभी विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध आज के पंजाब प्रदेश की महान बलिदानी जातियों जाटों, सिक्खों, राजपूतों को गुरुओं ने अपना बलिदान देकर बलिदान देने के लिए तैयार किया था। जब-जब इस देश में जाति और धर्म के नाम पर अन्याय, अत्याचार हुए तब-तब इसी जाति में युग पुरुष पैदा हुए जैसे-भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह आदि जिन्होंने मानव जाति को अन्याय अत्याचार से मुक्त कराया। हमें पुनः एक बार इस विकृत जाति एवं पंथवाद से मुक्त वेदान्त पर आधारित विश्व की पुर्नरचना के लिए इन जातियों और पंथों को मानवता की ओर मोड़ना होगा और अपने राष्ट्र तथा विश्व के अनेक धर्मों के साथ समन्वय स्थापित करना होगा।
वर्ण विज्ञान के अनुसार क्षत्रिय शक्ति का प्रतीक है। शक्ति के बिना ज्ञान नपुंसक है। दुर्भाग्य से भारत एक हजार वर्ष से शक्तिहीन हो गया है। इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है, हम स्वयं ही हैं। इसलिए पुनः शक्तिवान बनने के लिए किसी दूसरे की ओर नहीं देखना है। सिर्फ अपने क्षत्रिय धर्म का आचरण करना है। जब आप क्षत्रिय धर्म का पालन करेंगे तो सम्पूर्ण समाज आपको नेतृत्व भी सौपेंगा। धर्म और वर्ण धर्म के उदय का पूर्ण अवसर आ गया है। जो इसको पहचानेंगे और छात्र धर्म का आचरण करेंगे वे समाज में अपना स्थान बनायेंगे। जो युग धर्म नहीं पहचानेंगे, वे पिछड़ जायेंगे और स्वयं दलित हो जायेंगे। क्षत्रिय केवल सामान्य मानव नहीं बल्कि विशिष्ट मानव के रूप में पहचाने जाते हैं इसलिए हमें अपने राष्ट्रीय मानव कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। हमें अपनी शक्ति को राष्ट्रहित में लगाने की तैयारी करनी है। अपनी युवा शक्ति को ज्ञान एवं शक्ति से सम्पन्न बनाकर प्रशिक्षित करना है ताकि ये अपने स्वधर्म का पहचाने।
भोग परायण संस्कृति के विरुद्ध आम आदमी जो शोषण और दमन का शिकार हो रहा है के लिए क्षत्रियों को आगे आना होगा इससे पूरा विश्व छात्र धर्म को समझेगा और मानवता को शोषण से मुक्ति मिलेगी। आज क्षत्रिय राजनैतिक आर्थिक अधिकारों से भी वंचित है और संख्या की राजनीति में शक्तिहीन हो गये हैं। इसके अलावा क्षत्रियों के अस्तित्व पर राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक हमले हो रहे हैं। इससे क्षत्रिय शक्तिहीन एवं प्रतण्डित हो रहा है। राष्ट्र को रक्षा करने वाले ही यदि स्वयं शक्तिहीन हो जायेंगे तो समाज की रक्षा कौन करेगा। इसलिए जागो, उठो और अपनी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान की तैयारी करो। किसी कौम के सामने जब ऐसे संकट खड़े होते हैं तब या तो वो हमेशा के लिए दासत्व स्वीकार कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेती है अथवा इन चुनौतियों का जबाव देने के लिए फिर उठ खड़ी होती है। आज क्षत्रियों को पुनः उठ खड़ा होना है या अपने कुल, गौरव, मान मर्यादाओं एवं संस्कृति को छोड़कर नष्ट हो जाना है।
हम अपना एक नया इतिहास बना सकते हैं हमें सदैव आशावादी होना चाहिए। निराशा का नाम ही मृत्यु है यह किसी भी व्यक्ति अथवा समाज पर लागू होती है। हमें अन्तर्राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा द्वारा चलाये जा रहे मिशन राजपूत इन एक्शन के इस संघर्ष में अपने सजातीय बुद्धिजीवियों को मार्गदर्शन तथा व्यापारियों का आर्थिक सहयोग लेना है यही युगधर्म है।
वर्तमान युग परिवर्तन की घड़ी में क्षत्रियों को अपना राष्ट्रीय और मानीवय कर्तव्य समझना होगा। इतिहास और महापुरुषों से प्रेरणा लेनी होगी। हमारे यहां आदिकाल से लोक कल्याणकारी राजतन्त्र रहा है। उसकी अपनी मर्यादाऐं थीं। जिसे सामन्ती युग कहते हैं उस सामन्त शब्द का जन्म विदेशी बर्बर कौमों के गुलामी के काल में हुआ। सामन्त शब्द पश्चिम की देन है जब तक समाज रहेगा समाज की व्यवस्था के लिए एक संचालन सूत्र रहेगा। भारत के अतीत का समाज विज्ञान पूर्ण और धर्म आधारित है। इसीलिए हमें अपने अतीत मानव कल्याणकारी क्षत्रिय वर्ण धर्म के पुर्नउत्थान साहसपूर्वक अपने विचारों को जगत में रखना चाहिए। आधुनिक भारत में क्षत्रियों को छात्र धर्म अपनाना होगा यदि क्षत्रियों ने अपना स्वधर्म अपना लिया तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो राज्य व्यवस्था का संचालन सूत्र उनके हाथ से छीन सके। इतिहास में भगवानों के रूप में जिनकी पूजा हुई और हो रही है वे सब क्षत्रिय पुत्र ही हैं। बोद्ध और जैनों ने तो भावी युगों के लिए यह कहा है कि आगे आने वाले युगों में क्षत्रियों में ही भगवान बुद्ध और महावीर आयेंगे। आधुनिक युग के संदर्भ में पृथ्वीराज चैहान, राणा प्रताप, शिवाजी, दुर्गादास राठौर, गुरु गोविन्द सिंह जैसे क्षत्रिय आयेंगे। इतनी महान ऐतिहासिक पूंजी के वारिस अपने क्षत्रिय धर्म को पहचानें । भारत और विश्व जननी भारत माता की निगाहें इसी क्षत्रिय पुत्र के अवतरण की प्रतीक्षा कर रही हैं।
विराट क्षत्रिय समाजः-
वे सब सैनिक जातियां जो अपने आर्थिक पिछड़ेपन के कारण पिछड़े वर्ग में आती हैं वे सब जातियां जिनका चरित्र लड़ाकू है और जिनके राज्य भी रहे हैं विराट क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग है लेकिन ऐतिहासिक तथा आर्थिक कारणों से हम टूट गये हैं। हमको पुनः एकीकरण के लिए काम करना होगा स्मरण रहे कि इतिहास ने हमारे अनेक भाईयों को हमसे अलग किया है। हमें हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने गले लगाना होगा तभी हमारी शक्ति बनेगी यदि वे सभी क्षत्रिय जातियां संगठित हो जायें तो क्षत्रिय संख्या की दृष्टि से भी शक्तिशाली हो जायेंगे। यदि क्षत्रिय शक्ति संघर्ष करे तो ये वर्ण अपने खोये हुए स्थान को पुनः प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि अभी तक यह वर्ग पश्चिम के वैचारिक हथियारों से लड़ते रहे हैं। इसलिए विफल भी रहे हैं। अब ये शक्तियां जागृत हो रही हैं और वह अपने भारतीय विचारों के हथियारों से लड़ने को तैयार है। आयुवान सिंह स्मृति संस्थान द्वारा चलाई जा रही विचार क्रांति इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानव कल्याण के लिए हितकर सिद्ध होगी ।


Tuesday, 2 April 2013

"दहेज प्रथा" (क्षत्रिय परम्परा या एक कुप्रथा)

 "दहेज प्रथा" (क्षत्रिय परम्परा या एक कुप्रथा)

आज के समाज में कन्या का पैदा होना एक अभिशाप हो गया है, लोग दहेज की इस प्रकार मांग करते हैं की कोई भी ईमानदार व्यक्ति ईमानदारी से उपार्जित धन के द्वारा उस मांग की पूर्ती नहीं कर सकता है ।इससे स्पष्ट है की दहेज की मांग करने वाले समाज के ईमानदार लोगो को भ्रष्ट होने को बाध्य करते हैं ,क्या ऐसे समाज को आप समाज कहना पसन्द करेगे ? आज जब किसी घर में कन्या का विवाह होता है तो सबसे पहले दहेज की पुर्ति के लिये उसके पिता ,माँ, भाई की जमीन बिकती है ! प्रश्न यह उठता है की आखिर जब जमीन नहीं रहेगी तब क्या बिकेगा ? दुसरा प्रश्न पैदा होता है कि जो बहिन अपने भाई की रोजी रोटी का साधन , उसकी जमीन को बिकवाने का हेतु बनती है उस भाई - बहन के बीच क्या सोहार्द रह पायेगा ? तीसरा प्रश्न है कि वर पक्ष के लोग जो कन्या पक्ष की रोटी रोजी का साधन बिकवाने के हेतु बनते हैं क्या वे सम्बन्धी कहलाने के लायक है व क्या उनके कन्या पक्ष के साथ जीवन में कभी भी मधुर सबंन्ध रह पायेंगे? यदि उपर्युक्त तीनो प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं , तो स्पष्ट है की यह दहेज प्रथा केवल परिवारो की आर्थिक स्थिती को ही नष्ट करने वाली है बल्की यह प्रथा समाज में आपसी वैमनस्य व असामाजिकता का विकास करने में सर्वाधिक सहयोगी है ! अधिक दहेज, अधिक सम्मान यह कल्पना यदि एक व्यक्ति में हो तो उसका ईलाज आसानी से सभंव है , लेकिन समाज का अधिकांश वर्ग ईसी दृष्टि से सोचने लगे तो फिर ईस कुरीती से सघंर्ष करने में बहुत कठिनाईया उत्पन्न हो जाती है ! लोग अपने स्वार्थ के लिये आज दुसरे के हित व अपने भविष्य का बलिदान कर रहें हैं व इस प्रकार स्वयं ही अपने लिये कब्र खोदने में व्यस्त है ! यह सारा कुकर्म परम्पराओ व रिति रिवाजो के नाम पर हो रहा है ! आज वर पक्ष व उसके साथ आने वाला बाराती कन्या पक्ष के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे शोषण करने का अधिकार भगवान द्वारा उन्हे प्रदत किया गया हो ! जबकी हमारे समाज की परम्परा ईसके बिल्कुल विपरीत है ! राजा दशरथ राजा जनक से कहते हैं कि " आप महान हैं , आपकी और मेरी तुलना सभंव नहीं है , आपने कन्या का दान किया है व मैंने दान ग्रहण किया है ! दाता से दान ग्रहण करने वाला कभी बङा नहीं हो सकता है !"
कहने को तो हम भी आज कन्यादान ही करते हैं, लेकिन हम दान नहीं लेते, हम तो धौस व् डर दिखाकर किसी का शोषण कर रहे हैं, जिसको डकैती कहा जा सकता है, ऐसे लोग दान ग्रहण कर्ता नहीं हैं ! क्या यह दशरथ व् जनक द्वारा स्थापित परम्परा है ? और यदि नहीं है तो यह डकैतों की परम्परा क्षत्रिय परम्परा नहीं है ! यदि हमें क्षत्रिय के रूप में जिन्दा रहना है तो इस परम्परा का त्याग करना ही होगा !
पहले लोग दान में भी कुछ न कुछ मर्यादा का निर्वाह करते ही थे ! किस वस्तु का दान लिया जा सकता है या लेना चाहिए यह एक विचारणीय प्रश्न है ! हम तो आज लोहे का भी दान ले रहे हैं, जिसको ब्राह्मण भी धारण नहीं करता! यदि इसी प्रकार से अमर्यादित जीवन पद्दतियां चलती रहीं तो विनाश के सिवाए कोई विकल्प नजर नहीं आता है! इस कुरीति के भी प्रचलन में महिलाओं का सर्वाधिक योगदान है, दूसरों से स्पर्धा कर वे अपने पुत्र के लिए अधिकाधिक दहेज़ की मांग करती हैं व अन्ततोगत्वा यह दहेज़ पुत्र-वधु के दुर्व्यवहार के रूप में प्रकट होकर उनके लिए ही कष्ट का सबसे बड़ा साधन बनता है !
अतः यदि हम चाहते हैं की भाई -बहिन के बीच स्नेह रहे, यदि हम चाहते हैं की हमारी संतानें सुखी पारिवारिक जीवन व्यतीत करें, यदि हम चाहते हैं की पुत्र वधुएँ परिवारजनों का आदर करें, उनकी सेवा करें, तो हमें इस विनाशकारी बुराई से मुक्त होना ही पड़ेगा ! दहेज़ मांगने की परम्परा का परित्याग करना पड़ेगा ! तभी समाज में वास्तविक सामाजिकता का विकाश होगा ! समाज, व्यक्ति तब शोषक नहीं कहलायेगा, लोगों में समाज के प्रति स्नेह उत्पन्न होगा व सामाजिक गतिविधियों में लोगों की रूचि पैदा होगी ..!!

लेखक :- आदरणीय श्री देवीसिंह जी महार
पुस्तक :- क्षत्राणी ,संस्करण -4 (कुवंर आयुवान सिंह जी हुडील स्मृती संस्थान , जयपुर)