Thursday, 17 September 2015

रक्षक देवता सदाशिव पुत्र श्री कलि गणेश l

सदाशिव पुत्र और हमारे रक्षक देवता श्री कलि गणेश जी का यह चित्र गणेश जी के परम धाम गढ़ रणथम्भोर में स्थापित प्रतिमा का ही है और मूल गणेश पुराण में वर्णित गणेश वंदना के आधार पर भी यही है। जिनका मन्त्र इस प्रकार है 

" ॐ शवेतास्व संस्थाय सितान्गधर्त्रे, क्षत्र वृतायासि लसत्कराय !
पीतांशुकाय द्विभुजान्विताय, धूम्र ध्वजायास्तु कलौ नमस्ते!!"

अर्थ -सफेद घोडे पर विराजमान है बर्फ के जैसे रंग के अंग है जिन्होने क्षात्र धर्म पालन का व्रत धारण कर रखा है जिनके एक हाथ मे तलवार शोभायमान है । पिताम्बर यानि पीले वस्त्र पहने हुए है दो भुजाओ वाले ,धुम्र {श्वेत बादल जैसी } वर्ण कि ध्वजा वाले, कलयुग के गणेश जी आपको प्रणाम करता हू ।

चारो युगो के गणेश अलग अलग होते है-
1-सतयुग -10 भुजा सिह सवारी
2-त्रेता युग - 6 भुजा , मोर सवारी
3-द्वापर युग - 4 भुजा सिन्दुर के समान रग , चुहा सवारी
4-कलयुग - 2 भुजा , सफेद घोडा सवारी ।
द्वापर के गणेश जी के भी न सुण्ड थी, न तोन्द थी, न हाथी का सर था ।

विघ्नहर्ता,मंगलकर्ता आप सब के जीवन में नूतन उत्साह का संचार करे समस्त विपत्तियों से आप सबकी और आपके परिवार की रक्षा करे...श्री गणेश भगवान हमें सारी बुराइयो से दूर रख कर आप हमें अपने चरणों में स्थान देवे ।
सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई एव शुभकामनाए ..
श्री गणेश रिद्धि सिद्धि के साथ आपके घर विराजे..
आपने और आपका सगला परिवार ने गणेशचतुर्थी री घणी घणी शुभ कामनाएँ सा।। 

Monday, 18 May 2015

रक्षक देवता सूर्य पुत्र शनि l

हमारे रक्षक देवता सूर्य पुत्र शनि देव की आज जयंती है सभी को ढेर सारी शुभकामनाये सा l

ॐ नीलधुतिं शुलधरंम किरिटनम ग्रधस्थित त्रासहरम धनुर्धरम् l
चतुर्भुजम सुर्यसुतम प्रशान्तं वन्दे सदा अभिस्टकरम वरेण्यम ll

सूर्य पुत्र शनि देव से प्रार्थना है आप सब सुख- समृद्धिवान हो , कीर्तिवान हो , यशवान हो, आयुष्मान हो , स्वस्थ्य रहे, आपके जीवन का हर पल खुशियों से भरपूर रहे l जीवन के प्रत्येक क्षण आप प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे , आपकी कीर्ति की पताका निरंतर फहराती रहे l

आदित्य च सोमाय मंगलाय बुधायाचा l गुरु शुक्र शनिभ्याच राहुवे केतुवे नमः
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् l छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ll

हे शनि देव आप, हम सब की मानवीय अभिलाषाओं की पूर्ति में मार्ग दर्शन करते रहे l

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं, उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् l



Monday, 30 March 2015

सत्यम वद, धर्मंम चर

महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को संकल्प द्वारा बला व अति बला नाम की विधाएं प्रदान की गई जिनके द्वारा कभी नष्ट न होने वाला ज्ञान व कभी कलांत न होने वाला शारीरिक बल उन्हें मिला | इसके अलावा और भी अनेक प्रकार के शास्त्र व अस्त्र - शास्त्र की विधाएं संकल्प द्वारा विश्वामित्र जी ने श्री राम व लक्ष्मण को प्रदान की |


भगवान् कृष्ण द्वारा भी अर्जुन की रणक्षेत्र की मध्य में कुछ ही समय में वह दिव्य ज्ञान प्रदान किया गया ,जिससे अर्जुन शोक मुक्त होकर क्षात्र धर्म का पालन करने को तैयार हो सका |

हृदय के उदघाटन व प्राण के द्वारा प्राण से संसर्ग , ज्ञान का बीजारोपण व विद्याओं का आदान प्रदान , यह क्षत्रिय परम्परा रही है | जिसको केवल हृदयगत साधना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है |

पंडावादी तत्वों द्वारा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने व क्षत्रियों को उनके परम्परागत ज्ञान से विमुख करने के उद्देश्य से पुराणवादी ग्रंथों द्वारा यह प्रचार किया गया कि क्षत्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई है |

जिस हृदय में परमात्मा का स्वरूप स्वयं आत्मा निवास करती है | उससे मुख कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता | अतः अगर मुख से उत्पन्न होने वाले तत्वों को अपने आपको जगदगुरु सिद्ध करना हो तो उसके लिए यह आवश्यक था कि वे क्षात्र तत्व की श्रेष्ठता को लोगों की आँखों से ओझल करे |

इसलिए सारे पुराणवादी ग्रन्थ व आधुनिक पंडावादी विद्वान तक एक स्वर से यह घोषणा करते है कि बाल्मीकि रामायण झूंठी है ! झूंठी है ! झूंठी है !!!

जिन लोगों ने इतने धार्मिक ग्रंथो को नष्ट किया व उनमे परिवर्तन किया | उनकी नजरों से व कारगुजारियों से बाल्मीकि रामायण किस प्रकार से अछूती रह गई, यह भी आश्चर्यजनक बात है |

इस संदर्भ में बाल्मीकि रामायण के बाद हमे श्रेष्ठ ग्रन्थ महाभारत के बारे में भी थोड़ा विचार करना होगा |
यद्यपि यह ग्रन्थ पंडावादी कार गुजारियो से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा | इसमें जो थोड़े पतिवर्तन किये गए है , उनकी उपेक्षा कर दी जाए तो इस ग्रन्थ को भी बाल्मीकि रामायण की तरह संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में माना जायेगा |

महाभारत ग्रन्थ कि रचना महर्षि वेदव्यास ने की है , जबकि पंडों का कथन यह है कि पुराणों कि रचना भी व्यास जी द्वारा ही की गई है | जिसे कोई भी व्यक्ति , जिसने इन ग्रंथों को पढ़ा है , उसे स्वीकार नहीं कर सकते , बाल्मीकि रामायण में जितनी कथाओं का वर्णन आता है , पुराणों में उन कथाओं में उलट दिया गया है , जिससे रामायण को झूंठा साबित कर सके |

इसके अतिरिक्त महाभारत व पुराणों के विचार व तर्क भी एक दुसरे से मेल नहीं खाते | इससे यह स्पष्ट हे की पंडावादी पुराणों के रचनाकारों ने व्यास जी के नाम का दुरुपयोग करने की चेष्टा हे , जो अक्षम्य अपराध है |

इस बात को आधुनिक विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में स्वीकारा है की महाभारत की कुछ ऋचाओं को बदला गया है और कुछ कथाएं जोड़ दी गई है |
रामायण के रचनाकार बाल्मीकि जी के आश्रम में बनवास के समय श्री राम , लक्ष्मण व सीताजी दस वर्ष तक रहे |
इसके बाद कम से कम १६ वर्ष तक सीताजी लव कुश के साथ , उनके आश्रम में रही लेकिन बाल्मीकि जी ने अपने साथ वार्तालाप का कोई प्रसंग रामायण में नहीं दिया |
इससे स्पष्ट हे की महाभारत में व्यास जी के कथन के रूप में जो कथाएं कही गई है | वह बाद में जोड़ी गई है |
इसी प्रकार वैशम्पायन जी व जनमेजय के बीच के संवाद भी बाद में जोड़े गए है |
पंडावादी ग्रन्थों में विश्वामित्र जी के बारे में अनेक मन घडन्त कथाएं उनके चरित्र को आवश्यकता से अधिक उभारने की चेष्टा की है |

इन ग्रन्थ में परशूराम जी से सम्बन्धित प्रसंग भी आये है , अतः उन्हें भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता !!!